बाबा वीरेन्द्र देव दीक्षित का अाश्रम अाध्यात्म नहीं अय्याशी का अड्डा था। यहां रात हाेते ही लड़कियाें के चीखने चिल्लाने की अावाजें अाना शुरु हाे जाती थी। बाबा के अाश्रम का खेल ही निराला था। यहां पाप से मुक्ति के लिये बाबा से प्रसाद की पुड़िया लेनी हाेती थी। प्रसाद की पुड़िया भी अासानी से नहीं मिलती थी।
राम रहीम जैसी ही है वीरेन्द्र देव दीक्षित कहानी
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वीरेन्द्र देव दीक्षित अाश्रम में छानबीन करती पुलिस
राम रहीम की माफी जैसी ही है बाबा वीरेन्द्र देव दीक्षित की पाप से मुक्ति की कहानी। बाबा पहले लड़कियाें की कई चरणाें में परीक्षा लेता था। अगर लड़कियां परीक्षा में पास हाेती थीं ताे फिर अाती थी पाप से मुक्ति मिलने की रात। इस रात के लिये बाबा विशेष रूप से तैयारी करता था।
प्रसाद की पुड़िया खुद बनाता था बाबा
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वीरेन्द्र देव दीक्षित का अाश्रम
लड़कियाें के लिये प्रसाद की पुड़िया बनाता था। प्रसाद की पुड़िया बनाने का तरीका भी काफी सीक्रेट था। इस काम काे बाबा अपने गुप्त कमरे में अंजाम देता था। जब वह प्रसाद की पुड़िया बनाता था ताे उस कमरे में जाने की किसी काे इजाजत नहीं थी।
हर पुड़िया पर लड़कियाें का नाम लिख देता था बाबा
अाश्रम से छूटी लड़कियाें ने बताया कि प्रसाद की पुड़िया खाते ही उन्हें नीद अा जाती थी। कभी नशा हाे जाता था। बाबा इतना शातिर था कि हर पुड़िया पर लड़कियाें का नाम लिख दिया करता था। जिससे धाेखे से भी प्रसाद की पुड़िया बदल ना जाये।
काेरे कागज पर सभी लड़कियाें से लिखवाता था बुराईयां
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अाश्रम में पुलिस काे जाने से राेकती महिलायें
इसके बाद अाती थी पापाें से मुक्ति की रात। बाबा सभी लड़कियाें काे बुलाकर एक काेेरे कागज पर अपनी सभी बुराईयां लिखने के लिये कहता था। इसके बाद उस कागज पर लड़कियाें से हस्ताक्षर करवा कर सभी कागजाें काे एक पेटी में डाल देता था। पेटी से लकी ड्रा निकलता था।