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बिकरू कांड: विकास के बाद भी कायम खादी-खाकी और अपराधियों का गठजोड़, पुलिस के बारे में चौंकाने वाला खुलासा
Sat, 21 Aug 2021 02:26 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sat, 21 Aug 2021 02:26 AM IST
विकास दुबे कांड
- फोटो : amar ujala
बिकरू कांड खाकी-खादी और अपराधियों के गठजोड़ का नतीजा था। न्यायिक आयोग की जांच रिपोर्ट में इस मुहर भी लग गई है। विकास दुबे के बाद भी यह सिलसिला थमा नहीं है। जिले में अब भी अपराधियों और खाकी-खादी का गठजोड़ कायम है। खनन से लेकर सट्टा और अवैध शराब के धंधे तक पुलिस और नेताओं की सरपरस्ती में अपराधी फलफूल रहे हैं। इनमें कई ऐसे हैं, जो अपराध की दुनिया में विकास दुबे जैसा दखल रखते हैं। इससे बिकरू कांड जैसी वारदातें दोबारा होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इलाके में पंडित जी के नाम से मशहूर विकास दुबे का हर सियासी दल में दखल रहा तो आसपास के थानों की पुलिस भी उसके इशारों पर नाचती थी। हर गैरकानूनी धंधे में उसकी पत्ती चलती थी। जिले के आउटर में मिट्टी और रेत के अवैध खनन में भी उसके जैसे कई कुख्यात सक्रिय हैं।
विकास दुबे कांड
- फोटो : amar ujala
बिठूर, चौबेपुर, बिधनू, महाराजपुर समेत अन्य इलाकों में रात-रात भर जेसीबी और डंपर चलते हैं। खादी और खाकी इन माफिया की ढाल बनी है। इसलिए धड़ल्ले से अवैध कारोबार को अंजाम दे रहे हैं। इस खेल में एक सत्ताधारी जनप्रतिनिधि और उसके रिश्तेदारों की गहरी पैठ है। ये लोग एनसीआर के खनन माफिया के सीधे संपर्क में हैं। माफिया मनमाफिक रकम चुकाते हैं और उसी हिसाब से अवैध खनन करते हैं। ये वर्षों से चला आ रहा है। इसी गठजोड़ के बूते खनन माफिया के गुर्गे कई बार पुलिस व मीडियाकर्मियों पर हमला तक कर चुके हैं।
विकास दुबे कांड
- फोटो : amar ujala
पुलिस वाले ही बन गए हैं पार्टी
न्यायिक आयोग की जांच में पुष्टि हुई कि पुलिसकर्मियों ने ही विकास दुबे को दबिश की जानकारी दी थी। उस दर्ज मुकदमों में धाराएं भी हल्की लगाते थे, जिससे उसे आसानी से जमानत मिल जाए। एक तरह से पुलिसकर्मी ही पार्टी बन गए हैं, जो अपराधियों का साथ देते हैं। कुछ समय पहले हिस्ट्रीशीटर मनोज सिंह को नेताओं ने पुलिस कस्टडी से फरार कराया था। इसमें भी कुछ पुलिसकर्मी हिंस्ट्रीशीटर के कारखास थे, जबकि कुछ मनोज के विरोधी गुट के करीबी थे। इसीलिए चर्चा रही कि उन लोगों ने ही विरोधी पुलिसकर्मियों को सूचना देकर मनोज को गिरफ्तार कराने की साजिश रची। कुल मिलाकर बिकरू कांड होने के बावजूद पुलिस का अपराधियों से साथ नहीं छूट रहा है।
न्यायिक आयोग की जांच में पुष्टि हुई कि पुलिसकर्मियों ने ही विकास दुबे को दबिश की जानकारी दी थी। उस दर्ज मुकदमों में धाराएं भी हल्की लगाते थे, जिससे उसे आसानी से जमानत मिल जाए। एक तरह से पुलिसकर्मी ही पार्टी बन गए हैं, जो अपराधियों का साथ देते हैं। कुछ समय पहले हिस्ट्रीशीटर मनोज सिंह को नेताओं ने पुलिस कस्टडी से फरार कराया था। इसमें भी कुछ पुलिसकर्मी हिंस्ट्रीशीटर के कारखास थे, जबकि कुछ मनोज के विरोधी गुट के करीबी थे। इसीलिए चर्चा रही कि उन लोगों ने ही विरोधी पुलिसकर्मियों को सूचना देकर मनोज को गिरफ्तार कराने की साजिश रची। कुल मिलाकर बिकरू कांड होने के बावजूद पुलिस का अपराधियों से साथ नहीं छूट रहा है।
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विकास दुबे कांड
- फोटो : amar ujala
अपराधियों के बना दिए थे पासपोर्ट
डेढ़ साल पहले एसटीएफ ने गैंगस्टर वसीम बंटा और उसके भाई को गिरफ्तार किया था। जांच में पता चला था कि दोनों के कर्नलगंज थाने से पासपोर्ट बने हैं। वे विदेश भी गए, जबकि उन पर दर्जनों आपराधिक केस दर्ज थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस अपराधियों को किस तरह शरण देकर उनके अपराधों की भागीदार बनती है। ये भी गंभीर मसला था, मगर महज विभागीय कार्रवाई कर जांच रफादफा कर दी गई।
डेढ़ साल पहले एसटीएफ ने गैंगस्टर वसीम बंटा और उसके भाई को गिरफ्तार किया था। जांच में पता चला था कि दोनों के कर्नलगंज थाने से पासपोर्ट बने हैं। वे विदेश भी गए, जबकि उन पर दर्जनों आपराधिक केस दर्ज थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस अपराधियों को किस तरह शरण देकर उनके अपराधों की भागीदार बनती है। ये भी गंभीर मसला था, मगर महज विभागीय कार्रवाई कर जांच रफादफा कर दी गई।
विकास दुबे कांड
- फोटो : amar ujala
पुलिस की शह पर अवैध शराब का धंधा
ग्रामीण इलाका मिलावटी शराब का गढ़ बन चुका है। घाटमपुर, साढ़, सचेंडी और सजेती में बड़े पैमाने पर मिलावटी शराब बनती और बिकती है। तीन साल के भीतर तीन बार जहरीली शराब से लोगों की मौतें हो चुकी हैं। इन सभी घटनाओं में सफेदपोश की शह मिली थी। दिखावे के लिए उन पर और पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई हुई थी। इसके बाद भी अफसर यह दावा करने की स्थिति में नहीं हैं कि यह धंधा पूरी तरह से बंद हो गया। मतलब साफ है, सख्ती के नाम पर सिर्फ खानापूरी की जाती है।
ग्रामीण इलाका मिलावटी शराब का गढ़ बन चुका है। घाटमपुर, साढ़, सचेंडी और सजेती में बड़े पैमाने पर मिलावटी शराब बनती और बिकती है। तीन साल के भीतर तीन बार जहरीली शराब से लोगों की मौतें हो चुकी हैं। इन सभी घटनाओं में सफेदपोश की शह मिली थी। दिखावे के लिए उन पर और पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई हुई थी। इसके बाद भी अफसर यह दावा करने की स्थिति में नहीं हैं कि यह धंधा पूरी तरह से बंद हो गया। मतलब साफ है, सख्ती के नाम पर सिर्फ खानापूरी की जाती है।