यूपी विधानसभा चुनाव की विशेष कवरेज के लिए निकला अमर उजाला का चुनावी रथ 'सत्ता का संग्राम' सोमवार को बदायूं जिले पहुंचा। अन्य जिलों की तरह सड़कों, कूड़े-कचरे, बिजली, शिक्षा, विकास और सुरक्षा जैसे मु्द्दों पर तो बातचीत हुई ही, लेकिन दोपहर दो बजे युवाओं के साथ चर्चा के दौरान एक ऐसा मुद्दा उठा जिसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया। युवाओं ने राजनीतिक मुद्दों से इतर बदायूं को उसके गौरवशाली इतिहास की प्रसिद्धी वापस लौटाने को लेकर जोर दिया। उन्होंने इतिहास के ऐसे पन्ने पलट दिए जिनपर सदियों से धूल की परत चढ़ गई थी। ऐसे में हमें लगा कि आपको भी बदायूं की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा के बारे में जानना चाहिए।
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चुनावी रथ में युवाओं से हो रही बातचीत
- फोटो : अमर उजाला
बताया जाता है कि बदायूं पूर्व में वेदों की शिक्षा का केंद्र था। यहां वेदों पर गहरे अध्ययन किए गए थे, जिसके कारण इसका नाम 'वेदा मऊ' था। बदायूं में स्थित सूरजकुंड प्राचीनकाल का वह गुरुकुल है जहां वेदों की शिक्षा दी जाती थी। हालांकि बाद में यहां के शासक हुए राजा महिपाल ने उसका नाम बदलकर 'बदाऊ' कर दिया था, जो आगे चलकर बदायूं हो गया।
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चुनावी रथ में युवाओं से हो रही बातचीत
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इसके नाम को लेकर एक किंवदंती यह भी है कि बदायूं शहर की स्थापना राजा बुद्ध के द्वारा की गई थी। इसलिए एक समय में इसका नाम 'बुद्ध मऊ' भी था।
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बदायूं में नवाब इखलास खां का रौजा काफी प्रसिद्ध है। निर्माण के दौरान इसे ताजमहल की रूप रेखा देने की कोशिश की गई थी, जिसके कारण यह काला ताज भी कहलाता है। गुंबद और चारों कोनों में मीनारनुमा मकबरे में वास्तविक पांच कब्रें हैं। बताया जाता है कि यह इखलास खां और उनके रिश्तेदारों की कब्र है। हालांकि इसके अंदर जाने का रास्ता फिलहाल बंद कर दिया गया है।
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बदायूं की एक कहानी यह भी है कि गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए राजा भगीरथ ने वर्षों तक यहां तपस्या की थी। यहां बहने वाली बूढ़ी गंगा के किनारे एक प्राचीन टीले पर अनूठी गुफा है जिसे भगीरथ गुफा के नाम से जाना जाता है। कहा तो यह भी जाता है कि यह दैत्यगुरु शुक्राचार्य की तपोभूमि भी रहा है। यहां शुक्राचार्य ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए 80 हजार वर्षों तक तप किया था।