कुंभ मेले में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा हुआ है। इन्हीं में से एक फ्रांस से आई नामी ने कुंभ दर्शन के बारे में अमर उजाला के पत्रकार और छायाकार अनिरुद्ध पांडे से बात की। नामी ने बताया कि, '17वीं शताब्दी में भारत भ्रमण में आए बर्नियर द्वारा लिखी किताब 'बर्नियर की भारत यात्रा' में मैंने नागा संन्यासियों, साधु-महात्माओं की भारतीय संस्कृति के बारे में जितना पढ़ा था, उससे ज्यादा मुझे यहां देखने को मिला।'
संस्कृतियों के समागम की अद्वितीय हलचल। नागाओं के योग,हठयोग से लेकर उनके शंख फूंकने, लाठी-तलवार भांजने, मंत्रोच्चार से लेकर यज्ञ-हवन, जप-तप और ध्यान तक का एक साथ संगम पहले कभी नहीं देखा था। नागा संस्कृति और हठयोगियों, ध्यानियों की दिनचर्या के बारे में फैंविक्स बर्नियर की किताब में जैसा पढ़ा था, कुछ वैसा ही दिखा।
कुंभ में संगम तट पर पहली बार पहुंचीं फ्रांस की नामी ने अमर उजाला से बातचीत में अपने अनुभवों को इसी तरह साझा किया। नामी कहती हैं कि उन्होंने 17वीं शताब्दी में भारत भ्रमण पर आए फैंविक्स बर्नियर केसंस्मरण को पढ़ा था। बर्नियर के संस्मरण को पढऩे के बाद ही उनके मन में इस संस्कृति से रूबरू होने की जिज्ञासा पैदा हुई। इसी दौरान प्रयाग केकुंभ के बारे में जानकारी मिली। फिर क्या था, नामी ने यहां आने की योजना बना ली। बताती हैं कि वह इन नागाओं को देखने और इनकेबारे में करीब से जानने के लिए उतावली थी।
नौ फरवरी को यहां पहुंचीं तो इन साधुओं के समूह को देखकर अचंभित रह गईं। बर्नियर केलिखे वाक्य इतने सालों बाद भी छोटे जान पड़ रहे थे। साथ ही कुंभ में उमड़ा अपार जन समूह, जो इन्हीं नागाओं के ईर्द-गिर्द मंडराता नजर आया। यह सब कुछ नामी के लिए किसी अजूबे से कम नहीं लगे। संगम स्नान करना, पूजा यह सब देखना उनके लिए नई अनुभूति थी। वह कहतीं हैं कि कुंभ का यह दृश्य उन्हें कभी भुलाए नहीं भूल सकेगा।
नामी फ्रांस के एक रेस्तरां में काम करती है। भारत को जानने की उसकी लालसा रही है। वह 10 दिन की भारत यात्रा पर आई हैं। यहां से वह बनारस,आगरा और दिल्ली होते हुए वह स्वदेश लौट जाएगी। वह बर्नियर के संस्मरण से इस दौर की नागा संस्कृति की बार-बार तुलना करते नहीं थकतीं। बताती हैं कि तब से अब के बीच दुनिया बहुत बदल चुकी है, लेकिन नागा संस्कृति का वैभव और प्राचीन परंपरा उसी तरह बनी हुई है।