हाथी, पंजा, साइकिल संग आस्था के पक्ष में ‘विपक्ष’, तीर्थ पुरोहितों को अंग्रेजों ने दिए थे निशान
वहीं अक्षयवट मार्ग के करीब ‘साइकिल’ दौड़ रही है। ‘साइकिल’ निशान वाले मालवीय नगर के तीर्थपुरोहित ओमप्रकाश गौड़ कहते हैं, भइया ई निशान कब रखा गया, पता नहीं। लेकिन, इतना तो तय है कि इसका किसी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। हमारे यजमान कुंभ नगर में यही ‘साइकिल’निशान देखते हुए आ जाते हैं।
वरिष्ठ तीर्थपुरोहित राजेंद्र पालीवाल कहते हैं, समय के बदलाव के बावजूद तीर्थपुरोहितों के निशान नहीं बदले हैं क्योंकि वे जिसकेयजमान हैं, उनकी कई पीढ़ियों अपने तीर्थपुरोहित को इसी निशान से जानती, पहचानती आई हैं। तीर्थपुरोहितों के परिवार के बढ़ने और बंटने से उनकेकार्यक्षेत्र भी बंटे लेकिन एक ही कुल परंपरा के कारण उनके झंडे का निशान नहीं बदला। ये निशान ही उनकी पहचान हैं, जिसे सामान्य और अशिक्षित श्रद्धालु भी मेले की भीड़ में आसानी से खोज लेते हैं।
सबसे बड़ा ‘हाथी’निशान वाले तीर्थपुरोहित का कुनबा
‘हाथी’ निशान वाले तीर्थपुरोहित यानी अजैन परिवार का कुनबा सबसे बड़ा है। परंपरा के मुताबिक आज प्रयागवाल सभा के अध्यक्ष पंडित रामानंद शर्मा सहित उनके भाइयों नारायण प्रसाद शर्मा, कृष्णानंद शर्मा आदि के पास है। हालांकि इस परिवार में सोने का नारियल और ढोल जैसे निशान भी हैं, पर अजैन परिवार की मुख्य पहचान हाथी ही है।
तालुकेदारों ने दिए थे तीर्थपुरोहितों को निशान
तीर्थपुरोहितों के निशान की कहानी भी अजब है। आमतौर पर राजा-महाराजाओं, जमींदारों, तालुकेदारों ने ही अपने क्षेत्र के तीर्थपुरोहितों को निशान दिए थे। तो बुजुर्गों ने जनसामान्य के मुताबिक भी अपने झंडे के निशान रख लिए। ऐसा इसलिए कि संबंधित क्षेत्र के यजमान आएं तो उन्हें अपने तीर्थपुरोहित से मिलने में असुविधा न हो। ज्यादातर तीर्थपुरोहितों के झंडों के निशान आम जनजीवन के बीच से ही रखे गए ताकि उन्हें याद करने में असुविधा न हो।
तीर्थपुरोहितों को अंग्रेजों ने भी दिए निशान
राजाओं, जमींदारों से इतर अंग्रेजों ने भी तीर्थ पुरोहितों को कई निशान दिए थे जो आज भी उनकी पहचान बने हुए हैं। इसमें पांच सिपाही, बादशाही झंडा आदि शामिल हैं। अल्मोड़ा के तत्कालीन कमिश्नर ने तीर्थपुरोहित शीतल प्रसाद तिवारी को पांच सिपाही का निशान दिया था। वहीं दुर्गा प्रसाद शर्मा के पूर्वजों को ‘यूनियन जैक’ का झंडा मिला था, जो आजादी के बाद तिरंगे के रूप में तब्दील हो गया।
अजब-अनूठे निशान
तीर्थ पुरोहितों के झंडों के निशान में कलछुल, कनस्टर, नीम की टेरी, बेग-संदूक, ढाल लालटेन, तीन लोटा व चूल्हा, किला, भुजाली गंगाजी आदि शामिल हैं। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे निशान हैं, जिन्हें काल्पनिक तौर पर रखा गया है। इसमें सोने का कटोरा, चांदी का कटोरा, पीतल का पन्ना, चांदी का नारियल, सोने का नारियल, पीतल का घोड़ा, रुपया-मुहर आदि।
साधनों के नाम पर भी निशान
तीर्थपुरोहितों के निशान साधनों के नाम पर भी हैं। इसमें रेल का कोयले वाला इंजन, स्कूटर, कार, ट्रैक्टर, जहाज आदि शामिल हैं।