'जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझैं, सो ही भेष धरूंगी' की रट के साथ राधा की दासी बनी 'सखियां, कान्हा को रिझाने के लिए कुंभ मेले में आ जुटी हैं। कुंभ पर्व के दौरान स्त्री का रूप धरे अखाड़े-अखाड़े घूमती सखियां भजनों से कृष्ण के प्रति अपना अनुराग व्यक्त करती हैं। संतों, श्री महंतों, नागा संन्यासियों के ठौर पर जाकर भजन गाकर कान्हा को रिझाती और श्रद्धालुओं को लुभाती हैं। संतों से मिले न्योछावर से ही उनकी आजीविका चलती है। सखी भाव का यही राग संतों के शिविरों में गूंज रहा है।
कुंभ 2019: कान्हा को रिझाने कुंभ मेले में पहुंचीं सखियां, खुद को मानती हैं राधादासी
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तिलक तय करता है अखाड़े से नाता
निर्मोही अनी अखाड़ा, श्रीमहंत राजेंद्र दास ने कहा कि वैसे तो बैरागियों के तकरीबन सभी संप्रदायों में सखियां हैं लेकिन राधा बल्लभी निर्मोही अखाड़े से इनका करीबी नाता है। गले में तुलसी की माला और माथे तिलक लगाने का तरीका ही उनका संप्रदाय तय करता है। अगर वह रामानंदी संप्रदाय की हैं तो लाल तिलक और अगर कृष्णानंदी हैं तो माथे पर श्रीजी राधा के नाम की बिंदी होगी।
दिगंबर अनी अखाड़ा, श्रीमहंत कृष्ण दास नगरिया ने कहा कि शारीरिक रूप से यह पुरुष ही हैं लेकिन संगत के प्रभाव से मन में सखी भाव आकर सखी बन गईं। हालांकि सिर्फ सखी भाव आने से ही नहीं सखी बनने के लिए गुरुदीक्षा जरूरी है। कई वर्षों तक साधु रूप में परीक्षा केबाद गुरु ही तिलक सहित झोला, कंठी-माला के साथ मंत्र की दीक्षा और स्त्रियों के वस्त्र, शृंगार की वस्तुएं देकर सखी स्वरूप देते हैं।