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विदेशी श्रद्धालुओं ने जींस-टॉप छोड़ रंगाया गेरुआ, यूक्रेन-रूस से कुंभ में आकर रेती पर लगाया ध्यान

Mon, 21 Jan 2019 11:22 PM IST
kapil kumar अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज
अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: kapil kumar Updated Mon, 21 Jan 2019 11:22 PM IST
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kumbh mela 2019 saints Foreign devotees look in Saffron colors dress on sangam coast
foreigner Saints

जींस-टॉप, गाउन से लेकर पश्चिमी परिधानों के फैशन की चकाचौंध में रहने वाली कई बालाएं सनातनी संस्कृति के प्रभावित होकर जूना अखाड़े में संन्यासिनी बन चुकी हैं। उन्होंने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया है। अब वह घंटों ऊं नम: शिवाय और रामनाम का जप करती हैं। पूजा-ध्यान, हवन उनके संस्कार का हिस्सा बन गया है। कुंभ में सात समंदर पार से पहुंचीं ऐसी कई विदेशी संन्यासिनियां संगम की रेत पर इन दिनों साधना में रमी हैं। जूना अखाड़े की यह विदेशी संन्यासिनियां मौनी अमावस्या और वसंत पंचमी के शाही स्नान के बाद अपने वतन लौटेंगी।

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रूस की इजेब्क्स यूनिवर्सिटी से पर्यटन में स्नातक करने के बाद एक कंपनी में प्रबंधक की नौकरी करने वाली साउतिकोवा जूना अखाड़े की संन्यासिनी हैं। संस्कार के बाद उन्होंने अपने गुरु महामंडलेश्वर विष्णु देवानंद गिरि से संन्यास ग्रहण किया है। संन्यास की दीक्षा लेने के बाद उनका नाम आदि माता पड़ गया। अब वह इसी नाम से जानी जाती हैं।

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सोमवार को पायलट बाबा के शिविर में आदिमाता ध्यान-साधना में लीन थीं। काफी आग्रह के बाद वह अमर उजाला से मुखातिब हुईं। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में व्यक्तियों, विचारों, संस्कृतियों और स्वरूपों का ऐसा संगम उन्होंने कहीं नहीं देखा था। यह त्न-मन को शुद्ध करने का सुनहरा अवसर है। वह हृदय को क्लीन करने का संदेश देती हैं। आदि माता ने बताया कि वह चार बजे भोर से ही स्नान-पूजा के बाद गुरु की प्रेरणा से आसन, प्राणायाम, ध्यान, योग में जुट जाती हैं।

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वह लैपटॉप पर हमेशा संगम तट पर लगे कुंभ की तस्वीरें ट्विटर हैंडल के अलावा इंट्राग्राम व अन्य इंटरनेशनल एप्लीकेशन के जरिए अपलोड कर रही हैं, ताकि दुनिया इस संत समागम की आध्यात्मिक ऊर्जा का एहसास कर सके। इसी तरह यूक्रेन की जिस्शन को भी सनातनी संस्कृति से इस कदर प्रेम हुआ कि उन्होंने हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया है। जूना अखाड़े में उन्होंने संन्यास धारण कर लिया है। गले में रुद्राक्ष, तुलसी की मालाएं और हाथ में कंठी लिए वह शिविर में प्रबंध देखती रहती हैं। उनका नाम अब अविरंजनी गिरि हो गया है।

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साध्वी अविरंजनी मकर संक्रांति पर प्रथम शाही स्नान के समय प्रयागराज आई थीं। अब वह दो अन्य शाही स्नान भी करेंगी। साध्वी अविरंजनी ने पारिवारिक मायामोह का पूरी करह परित्याग कर दिया है। वह अखाड़े के शिविर में दो घंटा नियमित मेडिटेशन करती हैं। रूस की ही लीलिया भी गेरुआ वस्त्र रंगाकर जूना अखाड़े में संन्यासिनी बन चुकी हैं। शिविर में भक्तों को ध्यान-आसनों का अभ्यास कराने के साथ ही सनातनी संस्कृति का वह विश्व भर में प्रचार कर रही हैं। 

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