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माघी पूर्णिमा तक चलेगा महात्यागी संतों का कठोर अनुष्ठान, देखें धूनी पूजन की तस्वीरें

Mon, 18 Feb 2019 02:37 PM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: देव कश्यप Updated Mon, 18 Feb 2019 02:37 PM IST
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Hard penance of the saints will continue till Maghi Purnima
Kumbh 2019

कुंभ में संगम की रेती पर भगवान राम के अनुयायी महात्यागी संतों का प्राचीन, और सबसे कठोर 'धूनी पूजन अनुष्ठान जारी है। महात्यागी संत चार महीने से 18 वर्ष तक चलने वाले इस अनुष्ठान की शुरुआत वसंत पंचमी से करते हैं, जो कुंभ की माघी पूर्णिमा तक चलता है।


 
Hard penance of the saints will continue till Maghi Purnima
Kumbh 2019

कुंभ मेले से शुरू 'धूनी पूजन अनुष्ठान महात्यागी संतों के वाराणसी, अयोध्या, चित्रकूट आदि स्थानों पर उनके मठ, मंदिरों और आश्रम पर जारी रहता है। कुंभ के खाक चौक में रविवार को 'धूनी पूजन की पूजन की तैयारी भोर में ही शुरू हो गई। अनुष्ठान के लिए गाय के गोबर की उपली(कंड़ी) आदि सामग्री एकत्र की गई। दोपहर 12 बजे महात्यागियों के शिविरों में यह अनुष्ठान शुरू हुआ।

Hard penance of the saints will continue till Maghi Purnima
Kumbh 2019

इस कठिन तपस्या वाले अनुष्ठान के दौरान संतों ने चरणों के आधार पर गोल, अर्ध वृत्त, त्रिकोण और अन्य आकृतियों में रखी गई कंड़ी को घेरा बनाकर अनुष्ठान का संकल्प लिया। अनुष्ठान शुरू करने के लिए अग्नि प्रज्ज्वलित की गई।

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प्रयागराज में ही होता है धूनी पूजन

Hard penance of the saints will continue till Maghi Purnima
Kumbh 2019

धूप और बदरी के साथ बर्फीली हवाओं के झोकों के बीच तीन से चार घंटे तक कंड़े जलाने के बाद उससे निकलने वाले धुएं की बीच संतों ने तपस्या की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। मंत्रोच्चार संग अग्नि की ज्वाला और धुएं को बनाए रखा गया। धूनिपूजन की यह अग्नि (सुलगती कंड़ी) को कुछ संतों ने एक बर्तन में भरकर सिर पर रख अनुष्ठान के क्रम को आगे बढ़ाया।

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पंच महाभूतों मेंं अग्नि प्रधान

Hard penance of the saints will continue till Maghi Purnima
Kumbh 2019

महात्यागी संत मनोहर चरण दास के मुताबिक राष्ट्र कल्याण, विश्व शांति और समृद्धि के लिए धूनी पूजन अनुष्ठान सिर्फ प्रयागराज में ही किया जाता है। माघ मेला हो या कुंभ, यहां से वसंत पंचमी पर शुरू यह कठिन और लंबा अनुष्ठान उन स्थानों पर जारी रहता है, जहां इसका संकल्प लेने वाले संत निवास करते हैं।

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