कुंभ में संगम की रेती पर भगवान राम के अनुयायी महात्यागी संतों का प्राचीन, और सबसे कठोर 'धूनी पूजन अनुष्ठान जारी है। महात्यागी संत चार महीने से 18 वर्ष तक चलने वाले इस अनुष्ठान की शुरुआत वसंत पंचमी से करते हैं, जो कुंभ की माघी पूर्णिमा तक चलता है।
कुंभ मेले से शुरू 'धूनी पूजन अनुष्ठान महात्यागी संतों के वाराणसी, अयोध्या, चित्रकूट आदि स्थानों पर उनके मठ, मंदिरों और आश्रम पर जारी रहता है। कुंभ के खाक चौक में रविवार को 'धूनी पूजन की पूजन की तैयारी भोर में ही शुरू हो गई। अनुष्ठान के लिए गाय के गोबर की उपली(कंड़ी) आदि सामग्री एकत्र की गई। दोपहर 12 बजे महात्यागियों के शिविरों में यह अनुष्ठान शुरू हुआ।
इस कठिन तपस्या वाले अनुष्ठान के दौरान संतों ने चरणों के आधार पर गोल, अर्ध वृत्त, त्रिकोण और अन्य आकृतियों में रखी गई कंड़ी को घेरा बनाकर अनुष्ठान का संकल्प लिया। अनुष्ठान शुरू करने के लिए अग्नि प्रज्ज्वलित की गई।
प्रयागराज में ही होता है धूनी पूजन
धूप और बदरी के साथ बर्फीली हवाओं के झोकों के बीच तीन से चार घंटे तक कंड़े जलाने के बाद उससे निकलने वाले धुएं की बीच संतों ने तपस्या की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। मंत्रोच्चार संग अग्नि की ज्वाला और धुएं को बनाए रखा गया। धूनिपूजन की यह अग्नि (सुलगती कंड़ी) को कुछ संतों ने एक बर्तन में भरकर सिर पर रख अनुष्ठान के क्रम को आगे बढ़ाया।
पंच महाभूतों मेंं अग्नि प्रधान
महात्यागी संत मनोहर चरण दास के मुताबिक राष्ट्र कल्याण, विश्व शांति और समृद्धि के लिए धूनी पूजन अनुष्ठान सिर्फ प्रयागराज में ही किया जाता है। माघ मेला हो या कुंभ, यहां से वसंत पंचमी पर शुरू यह कठिन और लंबा अनुष्ठान उन स्थानों पर जारी रहता है, जहां इसका संकल्प लेने वाले संत निवास करते हैं।