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100वीं पुण्यतिथि : वारिसों का नामोनिशां नहीं, अपने ही शहर में बेगाने हुए अकबर इलाहाबादी

Thu, 09 Sep 2021 12:00 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 09 Sep 2021 12:00 PM IST
सार

तकरीबन 75 बरस की उम्र में इलाहाबाद में ही 9 सितंबर, 1921 को उन्होंने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें रुखसत हुए पूरे सौ बरस बीत गए लेकिन उनकी शायरी और श्रिख्सयत आज भी उसी तरह बुलंद है।

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100th death anniversary: No name of heirs, Akbar was set up in his own city in Allahabad
Prayagraj News : अकबर इलाहाबाद (फाइल फोटो)। - फोटो : social media

‘कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के, यां धरा क्या है ब-जुज़ अकबर के और अमरूद के’ कहने वाले नामवर शायर अकबर इलाहाबादी को क्या मालूम था कि जो शहर कभी उनके नाम से जाना जाता था, जिसकी चिट्ठियों में पते की जगह सिर्फ अकबर इलाहाबादी लिखा होता था, उसके इस दुनिया से रुखसत होने के बाद कोई निशानी बाकी नहीं रहेगी। 16 नवंबर 1846 को इलाहाबाद में पैदा हुए अकबर अदालत में एक छोटे मुलाजिम थे, लेकिन बाद में कानून का अच्छा ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह सेशन जज बने और इसी पद से रिटायर हुए। तकरीबन 75 बरस की उम्र में इलाहाबाद में ही 9 सितंबर, 1921 को उन्होंने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें रुखसत हुए पूरे सौ बरस बीत गए लेकिन उनकी शायरी और शख्सियत आज भी उसी तरह बुलंद है।

100th death anniversary: No name of heirs, Akbar was set up in his own city in Allahabad
Prayagraj News : काला डांडा कब्रिस्तान स्थित अकबर इलाहाबाद की मजार। - फोटो : प्रयागराज

वैसे तो अकबर से रिश्ता जोड़ने वाले जाने कितने हैं लेकिन खूनी रिश्ते से वारिसों का कोई नामोनिशां न होने से अकबर इलाहाबादी अपने ही शहर में तकरीबन बेगाने से  गए हैं। अकबर के नहीं रहने पर  उनसे जुड़ी चीजें भी जाने कहां गुम हो गईं। यहां तक कि लोग चिट्ठियां तक साथ ले गए।

100th death anniversary: No name of heirs, Akbar was set up in his own city in Allahabad
Prayagraj News : काला डांडा कब्रिस्तान स्थित अकबर इलाहाबाद की मजार। - फोटो : प्रयागराज

शहर में अकबर की यादों को संजोए हुए बस दो ही निशां बाकी हैं, उनकी रानी मंडी वाली कोठी ‘इशरत मंजिल’ जिसमें अब यादगारे हुसैनी इंटर कॉलेज है और दूसरा उनकी मजार, जो काला डांडा कब्रिस्तान में हैं, जहां शबेरात पर भी कुछ चाहने वालों के सिवा परिवार का कोई भी शख्स चरागां के लिए भी नहीं जाता।

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100th death anniversary: No name of heirs, Akbar was set up in his own city in Allahabad
Prayagraj News : चौक स्थित यादगारे हुसैनी इंटर कॉलेज जहां अकबर इलाहाबाद का घर था। - फोटो : प्रयागराज

हालांकि ऐसा नहीं कि अकबर लावल्द (नि:संतान) थे। उन्होंने पहली पत्नी के नहीं रहने पर दूसरी शादी की और दोंनो बीबियों से दो-दो संतान हुई। उनके जीवित रहते ही एक बेटे का निधन हो गया था जबकि बाकी बेटे पढ़ने के लिए विदेश चले गए और वहीं के होकर रह गए। देश के बंटवारे के वक्त बेटी पाकिस्तान जा बसी। जाने से पहले उन्होंने किसी करीबी रिश्तेदार को कोठी में बसा दिया था। वक्त के साथ कई बार करवट लेती हुई यह कोठी आज शिक्षा के केंद्र के रूप में मौजूद है।

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100th death anniversary: No name of heirs, Akbar was set up in his own city in Allahabad
Prayagraj News : चौक स्थित यादगारे हुसैनी इंटर कॉलेज जहां अकबर इलाहाबाद का घर था। - फोटो : प्रयागराज

बच्चे बोले, ‘चाचा जी स्कूल चाहिए’ और ‘इशरत मंजिल’ में आ गया यादगारे हुसैनी
वक्त के साथ अकबर की कोठी में कई तरह की तब्दीलियां हो चुकी हैं। बुजुर्ग बताते हैं, कभी जीटी रोड स्थित अफसर लिफाफा सेंटर के बगल से कोठी का रास्ता था, जो वक्त के साथ बदल गया और अब मुख्य दरवाजा रानीमंडी की ओर खुलता है। अकबर के नहीं रहने पर उनके तमाम चाहने वालों ने अकबर मेमोरियल सोसाइटी का गठन करके इसी कोठी में वर्ष1948 में पुस्तकालय की स्थापना की लेकिन माहौल अच्छा न होने से पुस्तकालय खुलता, बंद होता रहा।

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