कहते हैं कि अनुभव बेहद काम आता है। हाथरस के चंदपा कांड में शुरुआत से अनुभव की कमी बड़ी गलतियों की ओर इशारा कर रही है। शुरुआत से हुआ कुप्रबंधन इस मुद्दे के तूल पकड़ने और मीडिया के चंदपा में डेरा डालने का बड़ा कारण बना है। जब यह बात शासन को समझ में आई तो एसपी से लेकर सीओ, कोतवाल, एसएसआई और थाने के हेड मुहर्रिर तक के निलंबन की कार्रवाई हुई। मगर, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मीडिया को तरह-तरह की टिप्पणी करने और सियासी दलों को रोटियां सेकने का मौका मिल चुका था। कहते हैं कि जब सांप निकल गया, तब लाठी पीटने से क्या फायदा?
हाथरस प्रकरण में अगर पुलिस प्रशासन न करता ये 10 गलतियां तो चंदपा में न लगता मीडिया का डेरा
बात 14 सितंबर की सुबह 9:30 बजे शुरू हुई। खेत में मां के साथ घास काटने गई युवती हमले में जख्मी होती है। उसे मां व भाई थाना चंदपा लाते हैं। वे अपने गांव के एक युवक के खिलाफ हमले की तहरीर देते हैं। बेटी को पुलिस मेडिकल परीक्षण के लिए जिला अस्पताल और फिर वहां से जेएन मेडिकल कॉलेज तक लेकर आती है। इसके पांच दिन बाद यानि 19 सितंबर को कुछ सियासी लोगों की एंट्री हुई। मगर, पुलिस प्रशासनिक अमला समझ नहीं पाया और परिवार को विश्वास में नहीं ले पाया। बस वहीं से प्रकरण ने टर्न लिया और बात छेड़खानी से लेकर दुष्कर्म तक पहुंच गई।
इस बीच बेटी की तबियत बिगड़ी तो उसे हायर सेंटर ले जाने में भी देरी हुई। इसी बीच चंद्रशेखर आजाद की एंट्री और उनके आने पर रोकटोक ने भी मुद्दे को तूल दिया। अगर वे आते और चुपचाप मिलकर चले जाते तो शायद अखबारों में छोटी सी जगह पाते। मगर रोकटोक ने उन्हें अधिक तवज्जो देने पर मजबूर किया।
इसके बाद जब बिटिया की मौत हुई, तो परिवार का आरोप है कि पुलिस प्रशासन ने उसका अंतिम संस्कार भी उन्हें करने नहीं दिया। इसमें भी प्रशासन ने मीडिया व विपक्षियों को मुद्दे को तूल देने वाला काम यह कर दिया कि हिंदू मान्यता के विपरीत रात 2 बजे अंतिम संस्कार करा दिया। जिसमें मां-बाप के शामिल न होने का आरोप है। बस वहीं से टीवी मीडिया ने डेरा जमाना शुरू किया तो मीडिया पर 27 घंटे तक रही पाबंदी ने मुद्दे पर और जोर दिया। अगर परिवार से बात कर मीडिया वहां से चला गया होता तो शायद मुद्दा इतना तूल न पकड़ता। इसी बीच हाथरस आते राहुल व प्रियंका गांधी से धक्का-मुक्की, उनको न आने देने की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बनीं। कुल मिलाकर अगर इस तरह की छोटी-छोटी गलतियां न होतीं तो शायद आज मुद्दा इतना तूल न पकड़ता।
1- हाथरस से जेएन मेडिकल कॉलेज और सफदरजंग जाने तक परिवार का विश्वास न जीत पाना
2- परिवार का अगर विश्वास जीत लिया होता तो तीन-तीन बार बयान बदलने की जरूरत न पड़ती
3- परिवार का विश्वास ही वजह बना कि 26 सितंबर को बेटी एम्स रेफर न हो सकी, 28 को गई
4- रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण यहां उसके समुचित इलाज की व्यवस्था न थी, इलाज में देरी
5- जेएन मेडिकल कॉलेज में चंद्रशेखर आजाद के आने से पाबंदी की खबर पर मुद्दे ने तूल पकड़ा
6- चंद्रशेखर आते, बिना किसी रोकटोक के मिलकर चले जाते तो वह अखबार की सुर्खियां न बनते
7- सफदरजंग में बिटिया की मौत पर आधी रात के बाद अंतिम संस्कार और वह भी परिवार को दूर रखा गया
8- मौत के बाद उसके परिवार से मिलने आते राहुल-प्रियंका गांधी को नोएडा में रोकने से तूल बढ़ा
9- घटना तूल पकड़ने पर परिवार से बात करने को मौके पर जमी मीडिया को 27 घंटे रोके रखना
10- इतना सब होने के बाद जिले के उच्चाधिकारियों व परिवार की बातचीत के वीडियो वायरल हुए