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'टेसू मेरा यहीं खड़ा, मांग रहा है दही बड़ा', बच्चों के अनोखे खेल से जिंदा है प्राचीन परंपरा

Wed, 09 Oct 2019 12:21 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Wed, 09 Oct 2019 12:21 AM IST
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tesu jhanjhi folk tradition start on dussehra in agra mathura
टेसू झांझी से सजे बाजार - फोटो : अमर उजाला
तीन लकड़ी, उस पर एक ओर टेसू राजा, दूसरी ओर मंत्री और चौकीदार। बालक और बालिकाओं के इस गजब खेल से अब भी ब्रज की गलियों में प्राचीन परंपरा जीवित है। विजयदशमी के पर्व के साथ ब्रज के गांवों में महाभारत काल से जुड़ी टेसू-झांझी की पांच दिवसीय परंपरा मंगलवार से शुरू हो गई। जो शरद पूर्णिमा पर टेसू-झांझी के विवाह के साथ संपन्न होगी। शहर से लेकर गांव-देहात तक टेसू झांझी की दुकानें सज गई हैं।
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टेसू झांझी से सजे बाजार - फोटो : अमर उजाला
आगरा के बाह, जरार, जैतपुर, बटेश्वर, भदरौली आदि बाजारों में सोमवार को लोग टेसू झांझी की खरीदारी करते दिखे। मंगलवार की रात से लड़के गांव की गलियों में टेसू की गईया हाय रे दईया, असी डला भुस खाय, बडे़ ताल को पानी पिये..., टेसू अगर करे, टेसू मगर करे, टेसू लेके ही टरे, टेसू मेरा यहीं खड़ा, मांग रहा है दही बड़ा, दही बड़े में बन्नी, लाओ सेठ अठन्नी जैसे जैसे गीतों के साथ समूह में निकलेंगे। झांझी के साथ लड़कियां भी चली है प्यारी झांझी, हम सबसे मुखड़ा मोड़ आदि गीत गाते घर-घर पहुंचेंगी। 
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टेसू झांझी बनाते लोग - फोटो : अमर उजाला
साहित्यकार डॉ बीपी मिश्र, इतिहासकार डॉ शिव शंकर कटारे ने बताया कि यह लोक परंपरा महाभारतकाल से जुड़ी है। भीम के बेटे घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत में सेना का विनाश करते देख श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काटकर पहाड़ी पर एक पेड़ रख दिया था। युद्ध के बाद बर्बरीक की इच्छा पूरी करने के लिए शरद पूर्णिमा को विवाह निश्चित किया। तभी से यह लोक परंपरा चली आ रही है। 
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टेसू झांझी - फोटो : अमर उजाला
मानू, काशी, विश्वनथ प्राची मीनाक्षी यह सब नाम उन बच्चों के हैं, जो मथुरा के होलीगेट पर जोगी गली के रहने वाले हैं। शाम होते ही ये बच्चे टोली बनाकर शहर के मुख्य स्थल होली गेट चौराहे पर टेसू झांसी हाथ में लेकर निकल पड़ते हैं। हर दुकान, प्रतिष्ठान और कार्यालय में पहुंचकर उनके दवारा पारंपररिक गीतों को गाकर अनजाने में ही सही परंपरा को बचाए हुए हैं। 
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टेसू झांझी बनाता युवक - फोटो : अमर उजाला
एक दौर था जब नवरात्र खत्म होते ही टेसू-झांझी की ठेल लग जाती थी। कारीगर बनाकर दुकानदारों को बेचते थे। इनसे उनकी अच्छी कमाई हो जाती थी। अब परपंरा सिमटने के साथ कारीगरों का रोजगार भी छिनने लगा है। टेसू-झांझी बनाने वाले कारीगर बताते हैं कि पांच साल पहले तक अच्छी बिक्री होती थी। नवरात्र के एक महीने भर पहले से इससे बनाने का काम शुरू कर दिया जाता था। समय बदलने के साथ यह परपंरा भी अब सिमटने लगी है।
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