आगरा के श्री पारस अस्पताल में गड़बड़ियों की परतें उधड़ रही हैं। अस्पताल में कोविड मरीजों के उपचार में भी लापरवाही हुई। 30 बेड की अनुमति पर 96 मरीज भर्ती कर लिए गए। आईसीयू में विशेषज्ञ नहीं थे। चिकित्सा मानक पूरे नहीं थे फिर भी मॉकड्रिल को अंजाम दिया गया। गंभीर मरीजों की सांसें घुट गईं। 22 मौतों के आरोप लगे, प्रशासनिक जांच में दो दिन में 16 मृतकों की पुष्टि हो चुकी है। जिला प्रशासन ने श्री पारस समेत 46 कोविड अस्पताल बनाए थे। जिनमें श्री पारस को 30 बेड कोविड मरीजों के लिए आरक्षित किए। परंतु प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की आंखों में धूल झोंककर अनुमति से तीन गुना 96 मरीज भर्ती कर लिए। 25 अप्रैल को जब ऑक्सीजन संकट खड़ा हो गया, तो मरीजों की छंटनी के लिए मॉकड्रिल को अंजाम दिया गया। 26 अप्रैल की सुबह सात बजे पांच मिनट की मॉकड्रिल की गई। उस समय 10 मरीज बाईपैप, आठ वेंटिलेटर व 10 हाईफ्लो ऑक्सीजन पर निर्भर थे। कुल 28 मरीज गंभीर थे जबकि 25 से अधिक ऐसे मरीज थे जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत थी।
श्री पारस अस्पताल: कोविड मरीजों के उपचार में भी लापरवाही!, 30 पलंग की अनुमति पर भर्ती किए 96, आईसीयू मानक भी अधूरे
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आईसीयू में जगह की कमी के कारण उन्हें अलग वार्ड में रखा गया। अनुमति से अधिक मरीज भर्ती करने के मामले में प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही अब सामने आई है। एक मई के बाद 30 बेड की अनुमति को बढ़ाकर 50 बेड कर दिया गया। जबकि भर्ती मरीजों के लिए उपलब्ध सुविधाओं व चिकित्सकों का आंकलन ही नहीं किया गया। ये हाल तब रहा जब कोविड अस्पताल बनाने से पहले सीएमओ की टीम ने बकायदा अस्पताल का निरीक्षण किया और मरीज भर्ती करने की अनुमति दी गई। इस मामले में स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी संदिग्ध है।
अस्पताल में 30 बेड की अनुमति को दो मई को प्रशासन ने 50 बेड में बदल दिया। अनुमति में बेड संख्या बढ़ाने के बाद यहां बड़ी संख्या में मैनपुरी, इटावा, कासगंज, फिरोजाबाद और गैर जिलों के मरीजों की भर्ती शुरू हो गई। कोविड अस्पताल बनने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने दोबारा अस्पताल में निरीक्षण तक नहीं किया। प्रशासन की इस मेहरबानी पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
आईसीयू के नाम पर मजाक
आईसीयू के नाम से ही मरीज व तीमारदार घबराने लगते हैं। क्योकि गंभीर व आकस्मिक स्थिति में ही आईसीयू में मरीज को रखा जाता है। अमर उजाला पड़ताल में पता चला कि श्री पारस में आईसीयू में पर्याप्त जीवन रक्षक उपकरण व उन्हें चलाने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं थे। वेंटिलेटर, बाईपैप व अन्य श्वसन तंत्र संबंधी उपकरणों को एनेस्थेटिस्ट की देखरेख में चलाया जाता है, परंतु यहां अस्पताल संचालक डॉ. अरिन्जय जैन ने अकेले ही मॉकड्रिल का जोखिम उठाया। आईसीयू के नाम पर भी मरीजों से मजाक हुआ।
आठ लोगों की वेंटिलेटर पर मौत
श्री पारस अस्पताल में मॉकड्रिल के दौरान 22 मौतों के आरोप हैं। एसएन की डेथ ऑडिट कमेटी ने 26 व 27 अप्रैल को 16 मरीजों की मौत बताई है। इनमें आठ मरीज ऐसे हैं जो वेंटिलेटर पर भर्ती थे। दो मृतक ऐसे थे जो हाईफ्लो ऑक्सीजन पर निर्भर थे। अन्य मरीजों की मौत का ब्योरा प्रशासन ने सार्वजनिक नहीं किया है।