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चांदी के सिंहासन पर विराजमान बांकेबिहारी ने भक्तों संग खेली होली, आस्था से महक उठा मंदिर
Fri, 06 Mar 2020 02:21 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वृंदावन (मथुरा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वृंदावन (मथुरा)
Published by: मुकेश कुमार
Updated Fri, 06 Mar 2020 02:21 PM IST
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बांकेबिहारी मंदिर में भक्तों की भीड़
- फोटो : अमर उजाला
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वृंदावन में रंगभरनी एकादशी पर ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में होली की विधिवत शुरुआत हो गई। शुक्रवार की सुबह चांदी के सिंहासन पर विराजमान होकर बांकेबिहारी जी ने चांदी के पिचकारी से भक्तों संग होली खेली। श्वेत वस्त्र, मोर मुकुट, कटि-काछिनी धारण किए और कमर पर गुलाल का फैंटा बांधे बांकेबिहारी जी के दिव्य दर्शन पाकर भक्त आनंद से झूम उठे।
बांकेबिहारी मंदिर में भक्तों की भीड़
- फोटो : अमर उजाला
रंगभरनी एकादशी पर अपने आराध्य के साथ होली खेलने के लिए देशभर से हजारों बांकेबिहारी मंदिर में पहुंचे। सुबह जैसे ही मंदिर के पट खुले, पूरा परिसर ठाकुर बांकेबिहारी लाल के जयकारों से गूंज उठा। चांदी के सिंहासन पर विराजमान बांकेबिहारी जी के दर्शन पाकर भक्त धन्य हो गए।
बांकेबिहारी मंदिर में भक्तों की भीड़
- फोटो : अमर उजाला
सेवायतों ने ठाकुरजी के गालों पर केसर से बनी कीच लगाई। इसके साथ ही मंदिर में प्रेमरंग बरसने लगे। हुरियारे बने ठाकुर बांकेबिहारी जी की चांदी की पिचकारी से जब टेसू के रंगों की बौछार हुई तो पूरा मंदिर परिसर आस्था से महका उठा। बांकेबिहारी लाल के जयकारे से गूंजने लगे। मंदिर परिसर में मौजूद हर कोई इन प्रेम रूपी रंगों की वर्षा में सराबोर हो गया।
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बांकेबिहारी मंदिर में बरसे प्रेमरंग
- फोटो : अमर उजाला
यह है मान्यता
मान्यता है कि प्रिया (राधारानी) प्रियतम (श्रीकृष्ण) ने प्रेम भरी लीलाएं की थीं। उन्हीं लीलाओं में से एक लीला है होली। रंगभरनी एकादशी से प्रिया-प्रियतम होली की लीलाओं में मग्न हो जाते हैं। ठाकुर बांकेबिहारी गर्भगृह से निकलकर बाहर आ जाते हैं और लगातार पांच दिन बाहर ही रहकर रसिकों के साथ होली खेलते हैं। इन दिनों भक्तों को ठाकुर बांकेबिहारी जी का अद्भुत शृंगार देखने को मिलता है। पांचों दिन ठाकुरजी मलमल की सफेद पोशाक धारण करते हैं। कमर में गुलाल फैंटा तो हाथ में फूलों की छड़ी होती है।
मान्यता है कि प्रिया (राधारानी) प्रियतम (श्रीकृष्ण) ने प्रेम भरी लीलाएं की थीं। उन्हीं लीलाओं में से एक लीला है होली। रंगभरनी एकादशी से प्रिया-प्रियतम होली की लीलाओं में मग्न हो जाते हैं। ठाकुर बांकेबिहारी गर्भगृह से निकलकर बाहर आ जाते हैं और लगातार पांच दिन बाहर ही रहकर रसिकों के साथ होली खेलते हैं। इन दिनों भक्तों को ठाकुर बांकेबिहारी जी का अद्भुत शृंगार देखने को मिलता है। पांचों दिन ठाकुरजी मलमल की सफेद पोशाक धारण करते हैं। कमर में गुलाल फैंटा तो हाथ में फूलों की छड़ी होती है।
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बांकेबिहारी मंदिर में होली के रंगों की वर्षा
- फोटो : अमर उजाला
रंगभरनी एकादशी पर सुबह पन्नालाल गोस्वामी ने सेवा की। शाम को कन्हैयालाल गोस्वामी तथा घनश्याम गोस्वामी सेवा में रहेंगे। कन्हैयालाल गोस्वामी ने होली के बारे में बताते हुए कहा कि ऐसी अद्भुत होरी कहीं भी नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि बांकेबिहारी के बांके पुजारी, रंग गुलाल के बीच खड़े, ब्रज मंडल ते नभ मंडल तक, ब्रज की होरी लठ गढ़े।