द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण फागुन सुदी नवमी को होली खेलने बरसाना गए और बिना फगुवा (नेग) दिए ही वापस लौट आए। बरसाना की गोपियों ने कन्हैया से होली का फगुवा लेने के लिए नंदगांव जाने की सोची।
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लठामार होली
- फोटो : रवि बत्रा
इसके लिए राधाजी ने बरसाना की सभी सखियों को एकत्रित किया और बताया कि कन्हैंया बिना फगुवा दिए ही लौट गए हैं। हमें नंदगांव चलकर उनसे फगुवा लेना है। अगले दिन ही (दशमीं) को बरसाना की ब्रजगोपियां होली का फगुवा लेने नंदगांव आती हैं।
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लठामार होली
- फोटो : रवि बत्रा
‘दसमी दिन आ बरसाने हुरियारिन आ नंदगांम सजीं समकीलि कल कौ बदलौ अज देंय चुकाय बराबर हो कह गोरी रसीली’। राधा कृष्ण की अलौकिक होली लीला देखने के लिए भगवान सूर्य भी कुछ क्षण के लिए स्थिर हो जाते हैं।
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लठामार होली
- फोटो : रवि बत्रा
गोपियां भी सूर्य देव से कहती हैं कि सूरज छिप मत जइयो आज श्याम संग होरी खेलूंगी। सूरज छिपने तक तड़ातड़ लाठियां बरसती रहीं। वाकई अगर आपने बरसाना और नंदगांव की होली नहीं देखी तो कुछ नहीं देखा। यहां की होली में प्रेम बरसता है।
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लठामार होली
- फोटो : रवि बत्रा
परंपराओं का गुलाल उड़ता है। अगर संबंधों को निभाना सीखना है तो ब्रज वालों से सीखिए। नंदगांव के लोगों में सखा भाव और बरसाने में सखी भाव की मिठास आज भी जीवंत है। रविवार को नंदगांव में खेली गई होली में यह साफ नजर आया। एक तरफ बरसाने वाले थे तो दूसरी तरफ नंदगांव वाले।