देश पितृपक्ष के मौन में पितरों का तर्पण कर रहा है। मांगलिक कार्यों पर विराम लगा है। ठीक इसी समय आगरा की गलियां माता जानकी की मेहंदी के मंगलगीतों और राम बरात की तैयारियों से गूंज रही हैं। श्रीराम बरात व जनकपुरी के भव्य स्वागत की तैयारियां चरम पर हैं। यह वही अनूठी परंपरा है जो आगरा की रामलीला और जनकपुरी को पूरे देश में सबसे अलग और खास बनाती है। आस्था का यह महान उत्सव आज ऐतिहासिक पड़ाव को छू रहा है। आगरा की रामलीला के 150 वर्ष का स्वर्णिम सफर शुरू होने वाला है।
आगरा की रामलीला केवल एक धार्मिक मंचन मात्र नहीं, बल्कि इस शहर की सांस्कृतिक आत्मा है। इसकी ऐतिहासिक शुरुआत वर्ष 1885 में रावतपाड़ा स्थित लाला चन्नोमल की बारादरी से हुई थी। उस दौर में न तो आज जैसे भव्य-विशाल मंच थे और न ही दूधिया रोशनी की व्यवस्था। रावतपाड़ा के भगवानदास उर्फ भग्गामल डेरे वाले, लाला गिर्राज किशोर और पीपलमंडी के मुंशी शिवनारायण जैसे अग्रणियों ने चंदा जुटाकर और जरूरत पड़ने पर अपनी जेब से पैसे लगाकर इस पावन परंपरा की लौ जलाई थी।
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राम बरात आगरा
- फोटो : अमर उजाला
शुरुआती वर्षों में यह समाज का स्वतःस्फूर्त आयोजन बना रहा। इसके बाद वर्ष 1891 में इसे पहली बार संस्थागत स्वरूप प्रदान करते हुए श्रीरामलीला कमेटी का गठन किया गया। इसके पहले मंत्री बांकेलाल बने। 1908 में समाजसेवी लाला कोकामल जी ने इसकी कमान संभाली और जीवनपर्यंत इसे आगे बढ़ाने के लिए कार्य किया। कभी बैलगाड़ियों पर निकलने वाली राम बरात आज 110 से अधिक मनमोहक झांकियों, 15 से अधिक बैंड-बाजों, ऊंटों पर बजते नगाड़ों और दशरथ वंश की गौरवशाली पताका के साथ एक विराट सांस्कृतिक कारवां बन चुकी है। हाथियों के जुलूस पर रोक के बाद अब राजसी कृत्रिम हाथियों के विशेष रथों पर चारों भाई विराजते हैं।
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राम बरात आगरा
- फोटो : अमर उजाला
समय के साथ बढ़ता गया बजट
इस महोत्सव के बजट का सफर ही ताजनगरी की प्रगति और जन-सहभागिता की कहानी बयां करता है। कमेटी के प्राचीन अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1940 में पूरी रामलीला, राम बरात और जनकपुरी का कुल खर्च मात्र 10 हजार रुपये था, जिसमें आतिशबाजी पर 450 रुपये और अखाड़ों पर 350 रुपये व्यय हुए थे। वर्ष 1970 तक आते-आते यह बजट बढ़कर 80 हजार रुपये तक पहुंच गया।
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राम बरात आगरा
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उस दौर में कमेटी के पास 10 लकड़ी के रथ, 4 लकड़ी के घोड़े और ऐरावत हाथी का डोला हुआ करता था। जनसहयोग की सबसे अनुपम मिसाल वर्ष 1970 में देखने को मिली, जब 40 दानदाताओं के सामूहिक सहयोग से 75 हजार रुपये की लागत में एक भव्य चांदी का रथ तैयार कराया गया। यह ऐतिहासिक रथ आज भी राम बरात में भगवान श्री लक्ष्मी-नारायण के वाहन के रूप में शोभायमान होता है। आज जनकपुरी के विकास के लिए नगर निगम ने 12 करोड़ का बजट रखा है, जबकि आयोजन समिति की ओर से दो से तीन करोड़ रुपये खर्च करने का अनुमान है।
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जनकपुरी महोत्सव है रामलीला की आत्मा
रामलीला की सबसे अनूठी और जीवंत पहचान इसका जनकपुरी महोत्सव है, जिसमें तीन दिनों के लिए आगरा का कोई न कोई इलाका मिथिलापुरी के रूप में तब्दील हो जाता है। जनकपुरी का आयोजन 1954 में यमुना किनारे स्थित मथुरेश जी के मंदिर से शुरू हुआ था। इसके बाद 1955 में यह सदर बाजार में सजी और फिर इसने पूरे शहर की परिक्रमा शुरू कर दी।