हिमाचल में शहरी क्षेत्र के लोगों को मधुमेह रोग अपनी गिरफ्त में ले रहा है। गांवों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों के 15 से 18 फीसदी लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। गांवों में यह आंकड़ा 8 से 10 फीसदी है। देश के अन्य राज्यों की तुलना में हिमाचल के शहरी क्षेत्रों की हालत खराब है।
विशेषज्ञ चिकित्सक इसका कारण शहरी क्षेत्रों में शारीरिक कसरत कम और खानपान सही न होना बताते हैं। अगर इस पर ध्यान दिया जाए तो लोग इस बीमारी से छुटकारा पा सकते हैं। एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया के हिमाचल चैप्टर के अध्यक्ष और आईजीएमसी शिमला के मेडिसन विभाग से सेवानिवृत्त प्रोफेसर डा. राजीव रैणा ने कहा कि हिमाचल में अभी मधुमेह पर बहुत अधिक तथ्यात्मक सर्वेक्षण तो नहीं हुआ है।
यह सर्वेक्षण चल रहा है। शुरुआती तथ्यों के अनुसार प्रदेश की स्थिति चिंताजनक है। राज्य के शहरी क्षेत्रों में 15 से 18 फीसदी लोगों को मधुमेह है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 8 से 10 फीसदी लोगों को है। कुछ दशक पहले मधुमेह की बीमारी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महज 1 से 2 फीसदी लोगों में होती थी। लोगों के जीवन शैली बदलने के कारण यह बीमारी पांव पसारती जा रही है।
खाली पेट 100 से कम रहना चाहिए शुगर
डाक्टर राजीव रैणा ने बताया कि खाली पेट 100 से नीचे शुगर रहे तो इसे सामान्य माना जाता है। 100 से 125 से बीच इसे प्री-डायबिटिक स्टेज माना जाता है। 125 से अधिक डायबिटीज होती है। खाना खाने के बाद 140 से ऊपर शुगर हो तो यह डायबिटीज के लक्षण है। रैंडम जांच में 200 होने पर डायबिटीज होती है। मधुमेह की जांच केवल एक बार न करें, एक से अधिक बार करने पर ही इसका सही आंकलन होता है।
लोगों के जीन्स ही मधुमेह की बीमारी के लिए संवेदनशील
हिमाचल के लोगों के जीन्स भी मधुमेह की बीमारी के लिए संवेदनशील है। दक्षिण एशिया के लोगों में दुनिया के अन्य हिस्सों के लोगों की तुलना में जीन्स मधुमेह के अधिक कारक हैं। ऐसी स्थिति में लोगों को ऐसी जीवन शैली छोड़नी की जरूरत है।