देश को बिजली-पानी के संकट से उबारने के लिए बिलासपुर के कई गांव विस्थापित हुए। इन्हीं में से झंडूता के लुरहाड़ गांव के 70 परिवार आज भी गोबिंदसागर झील में एक टापू में आदिवासियों की तरह जीवन बसर कर रह रहे हैं। गांव तीन तरफ से गोबिंदसागर झील से घिरा है। 60 साल में आज तक यहां सड़क नहीं पहुंची। आवाजाही के लिए नाव ही सहारा है। पैदल चलने का रास्ता बरसात में बंद पड़ा है। मार्ग पर दलदल है। लुरहाड़ के ज्यादातर बुजुर्गों ने आज तक बस नहीं देखी। मरीजों को छह किलोमीटर दूर पालकी पर ले जाना पड़ता है। कई मरीज रास्ते में ही दम तोड़ चुके हैं।
गैस सिलिंडर सिर पर ढोने पड़ते हैं। अपना घर, जमीन छोड़ यहां बस तो गए, लेकिन किसी भी सरकार ने इनकी ओर ध्यान नहीं दिया। मनशो देवी (85) बताती हैं कि उन्होंने आज तक बस देखी तक नहीं है। उसमें बैठकर सफर करना तो दूर की बात है। कश्मीरी देवी (84) का कहना है कि डर लगता है कि बच्चों से भरी बोट झील में कहीं पलट न जाए। जोगेंद्र पाल (91) ने कहा कि गांव में नेताओं के दर्शन पांच साल में एक दफा ही होते हैं। सुनवाई कोई नहीं करता। शारदा देवी (84) ने कहा कि डैम के लिए ग्रामीणों ने अपनी जमीनें दे दीं, बदले में उन्हें सिर्फ दुश्वारियां ही मिली हैं।
गांव के लिए बरोहा ज्योरिपत्तन की मुख्य सड़क से मुसाहन-लुरहाड़ गांव को संपर्क देने के लिए करीब 6 किमी मार्ग बनाया गया है। मुसाहन से तीन किमी तक यह मार्ग पक्का हो चुका है, लेकिन आगे के तीन किमी पर दलदल के चलते आवाजाही मुश्किल है। गोबिंदसागर झील का जलस्तर बढ़ने से लोगों की मुश्किलें भी बढ़ जाती हैं।
दया राम (88) कहते हैं कि यहां से मरीज को पीठ पर या फिर पालकी में बैठाकर सड़क तक पहुंचाना पड़ता है। सरकार की एंबुलेंस सुविधा तक नहीं मिल पाती है। स्कूल कॉलेज और अन्य कर्मचारियों को भारी परेशानियों से गुजरना पड़ता है। अमर उजाला की टीम ने जब क्षेत्र के दुर्गु राम, कांशी राम, दया राम, रतनी देवी, जानकारी देवी, देवकू देवी, देवी राम आदि से बात की तो रुंधे स्वर में बोले ‘अपना सब कुछ भाखड़ा डैम के लिए दे दिया, लेकिन अब पूछने वाला कोई नहीं। हमें तो आज भी ऐसा लगता है जैसे गुलामी में जीवन काट रहे हैं।’