दुनिया के सबसे दुर्गम और रोमांचक ट्रैक में शुमार पवित्र राशिल-कुगती-मणिमहेश पैदल मार्ग जल्द गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो सकता है। इसके प्रस्ताव पर हामी भरने के बाद गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड की टीम जल्द इस रूट का दौरा करेगी। साल भर ग्लेशियरों से लकदक रहने वाले इस ट्रैक पर तीन दर्रे पार कर 7 दिन में लाहौल के राशिल से चंबा के मणिमहेश पहुंचते हैं। दावा है कि यह ट्रैक देश का सबसे लंबा और दुर्गम है।
इस ट्रैक पर समुद्रतल से 16800 फीट ऊंचे कुगती दर्रा को पार करना पड़ता है। अगस्त में इस रूट से होकर जनजातीय लोगों का जत्था सदियों से पौरी मेले के बाद पैदल पवित्र मणिमहेश की यात्रा पर निकलता है। कुगती दर्रा हिमालय की पीरपंजाल रेंज का सबसे ऊंचा दर्रा है। यह दर्रा साल भर ग्लेशियरों के नीचे दबा रहता है। ऑक्सीजन की कमी के चलते इस रूट से पैदल यात्रा करना बेहद कठिन है। एनजीओ ग्रामीण युवा संगठन ने इस रूट को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने के लिए कुछ दिन पहले उनके मुख्यालय को ई-मेल किया था।
गिनीज बुक से मिले जवाब में कहा गया है कि जल्द इस संबंध में उनका भारत स्थित कार्यालय उनसे संपर्क करेगा। पहले उनकी टीम ट्रैक का खुद निरीक्षण करेगी। एनजीओ अध्यक्ष एडवोकेट सुदर्शन ठाकुर ने बताया कि गिनीज बुक को भेजे गए ई-मेल में मणिमहेश ट्रैक रूट की पूरी भौगोलिक स्थिति, ट्रैक की दूरी और ग्लेशियरों से लकदक तीनों दर्रों का हवाला दिया है।
इस रूट पर श्रद्धालु बिना किसी ट्रैकिंग तकनीक और साजो सामान के ही पैदल सात दिन तक यात्रा करते हैं। बीते दिनों रवाना हुआ जत्था मणिमहेश पहुंच गया है। अब इसी रूट से वापसी की तैयारी है। इसमें तीन श्रद्धालु नंगे पांव यात्रा कर रही हैं। मणिमहेश ट्रैक रूट पर दो बार पैदल यात्रा कर चुकी महिला श्रद्धालु ऊषा ने बताया कि रास्ते में तीन दर्रों के अलावा ग्लेशियर और दुर्गम पथरीला रास्ता है।
अगर यह रूट गिनीज बुक में दर्ज होता है कि तो इससे लाहौल के साथ पूरे हिमाचल के पर्यटन कारोबार को फायदा होगा। अनछुआ ट्रैक दुनिया के सैलानियों को आकर्षित करेगा। - अमर नेगी, एसडीएम केलांग एवं जिला पर्यटन अधिकारी