सिराज की युवा लोक गायिका गीता भारद्वाज हिमाचल की किसी भी बोली में गा सकती हैं। चाहे मंडी की सिराजी बोली, मंडयाली, शिमला की अप्पर महासुवीं बोली हो, कांगड़ी हो या फिर चंबयाली हो या फिर किन्नौरी या लाहौली बोलियां। वह कहती हैं कि उन्हें हिमाचल की हर कोने की लोक गायकी अच्छी लगती है।
फोल्क से उन्हें प्यार है, चाहे वह नेपाली या झारखंडी ही क्यों न हो। आने वाले समय में हिमाचल की कई बोलियों में नए गीत गाएंगी। मंडी जिले के थुनाग निवासी गीता भारद्वाज के गीत यूट्यूब और इंटरनेट के अन्य माध्यमों से खूब सुने जा रहे हैं। इन्हीं में एक ऑडियो एलबम ‘पहाड़ी करंट’ का लाखों लोगों पर जादू छाया हुआ है।
गीता भारद्वाज की गायकी को पिछले एक दशक से खूब पसंद किया जा रहा है। उन्होंने पहली बार प्राइमरी स्कूल थाचाधार से अपने गायन की शुरुआत की। चौथी कक्षा में पहला लोकगीत स्थानीय बोली में ‘शोभलिए लाल सूट नहीं लाणा’ गाया, जिसके लिए उन्हें पहला पुरस्कार मिला। इसके बाद तो लोकगायन उनका हमसफर बन गया। आगे वह वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला थुनाग में पढ़ीं। यहां भी उन्होंने कई पुरस्कार लिए।
आगे ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई हिमाचल विश्वविद्यालय की दूरवर्ती शिक्षा प्रणाली से की। इसी दौरान उन्होंने फोक में ‘तेेरे रे जमाना क्या-क्या रंग’ गीत का रिमिक्स प्रयोग किया तो यह सनसनी बन गया। यह हर शादी-विवाह के अलावा तमाम मौकों पर बजने लगा। मंच पर वह कार्यक्रम देतीं तो इसकी खूब फरमाइश होती रही। ‘ओरी दे खड़अ लूड़ने री दाची’ मतलब ‘इधर दो घास काटने की दराती’ गीत में उनके ठेठ लोकगायन को बहुत सराहा गया।
अनुराधा पौडवाल के साथ गा चुकी हैं
उन्होंने टी सीरिज में अनुराधा पौडवाल के साथ भी भजन गाए। वर्ष 2013 में इंडियन आइडल में वह बगैर किसी तैयारी के वह टॉप 25 तक पहुंच गई थीं। गीता के मम्मी-पापा कृष्णा भारद्वाज और गोपाल भारद्वाज खेतीबाड़ी का काम करते हैं। उनकी दो बहनें वनिता, सुनीता और भाई भवानी हैं। गीता ने बताया कि इन सबके सहयोग से वह लोकगायकी के इस मुकाम पर हैं और बहुत खुश है। आमदनी भी अच्छी होती है। नौकरी की भी कोई जरूरत नहीं।