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ये आलोचनाओं से घबराई नहीं बल्कि बनीं अपराजिता, पढ़ें कहानी

Wed, 02 Mar 2016 04:28 PM IST
Updated Wed, 02 Mar 2016 04:28 PM IST
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women's day special photo gallery amar ujala

कला-संस्कृति और साहित्य में भी कुछ ऐसी ही शख्सियते हैं जो आत्मविश्वास के दम पर सशक्त बनकर उभरीं। ये शख्सियतें बाधाओं से डरी नहीं। अपने सपने खुद बुने, घर-परिवार-समाज और नौकरी की सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए अपने कॅरिअर को, अपने शौक को एक नया आयाम दिया। रोली खन्ना बता रही हैं कि ये शख्सियतें आलोचनाओं से घबराई नहीं, बल्कि अपने काम और व्यवहार से उन्हें भी अपना मुरीद बना लिया।

ये आलोचनाओं से घबराई नहीं बल्कि बनीं अपराजिता, पढ़ें कहानी

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नसीम निकहत का जन्म बाराबंकी में हुआ। बुआ और फूफा ने गोद ले लिया और चलीं आईं लखनऊ। एक तरफ फूफा की दी आजादी, दूसरी तरफ बुआ के सख्त बंधन। उस पर से घर में सजने वाली बेंतबाजी की महफिलें। ऐसे मिले-जुले माहौल में मासूम मन के किसी कोने में नन्ही शायरा जन्म ले चुकी थी। गुनगुना नहीं सकती थीं, क्योंकि बुआ कहती थीं कि बडे़ घर की बेटियों का काम नहीं ये सब। आखिर जिसका डर था वही हुआ, स्कूल में एक कार्यक्रम में चार लाइनें क्या सुना दी, बुआ ने तूफान खड़ा कर दिया।

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बुआ ने कई थप्पड़ रसीद किए। इसके बाद मन और बगावती हो चला और फिर छिप-छिप कर सुनने-सुनाने का सिलसिला चल पड़ा। इस बीच फूफा चल बसे और मामी ने बिना पूछे- मेरी इच्छा जाने मेरा विवाह कर दिया। इस दौरान गजल मन में खुद-ब-खुद बनती जा रही थी। सौभाग्य से मेरे ससुर और पति को गजल व शेर-ओ शायरी का शौक था। एक दिन रसोई में मुझे कुछ गुनगुनाते सुना तो ससुर ने सुनाने को कहा। इसके बाद उन्होंने मुझे देवा में हुए मुशायरे में भेजा।

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नसीम बताती हैं देवा में मुशायरे में जबर्दस्त हूटिंग हुई तो मैं सन्न रह गई। इसके बाद मिले मौकों को मैंने भुनाया और खुद को साबित किया। देवा के बाद हिन्दुस्तान, नेपाल, पाकिस्तान, दुबई, अबूधाबी, बहरीन, शारजहां, जेद्दाह, कुवैत और अमेरिका जैसे शहरों में हुए मुशायरे में वह शिरकत कर चुकी हैं।

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आज जब नौकरी की धुन में लोग शौक को भूलते चले जा रहे हैं, ऐसे में यदि कोई अपने शौक को नई बुलंदियों पर ले जा रहा हो तो बात तो बड़ी होगी ही। ऐसा कम ही लोग कर पाते हैं। इन्हीं में से एक हैं आर्किटेक्ट वंदना सहगल। वंदना पढ़ाती भी हैं और इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी वक्त निकाल लेती हैं पेंटिंग के लिए। कहती हैं कि घर-बाहर सामंजस्य के बीच कैनवास पर अपना जुनून उकेर ही लेती हूं। फिलहाल एक टारगेट लेकर चल रही हूं कि साल में कम से कम एक प्रदर्शनी अवश्य लगाऊं। अब तक कई बार प्रदर्शनी लग चुकी हैं।

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