बिकने लगी शराब तो बुझने लगे महिलाओं और बच्चों के चेहरे, बेटा बोला- अब फिर वही शुरू हो जाएगा
केस-1: पापा सुबह ही जाकर ले आए शराब
सरोजनीनगर की 19 साल की बेटी बोली, पिछले एक महीने में पापा ने न तो एक बूंद शराब पी, न ही मम्मी को एक भी दिन रोना पड़ा। आम दिनों में शायद ही कोई दिन ऐसा होता हो, जब पापा शराब पीकर घर न आते हों। झगड़े की नौबत तो यहां तक आ जाती थी कि किसी-किसी दिन हमारे यहां चूल्हा ही नहीं जलता था। आज पापा सुबह ही जाकर शराब ले आए, फिर वही सब शुरू हो जाएगा।
केस-2: पापा बोले, अब नहीं पीएंगे
अलीगंज निवासी एक परिवार के बच्चों का कहना है कि लॉकडाउन में शराब न मिलने से हमारे घर में सब कुछ ठीक था। 13 साल का बेटा कहता है कि पापा रोज तो नहीं पीते थे, लेकिन हफ्ते में दो दिन जरूर पीते थे और उन दो दिन का दर्द हम लोग पूरे हफ्ते झेलते थे। जब तक दर्द सही होता, फिर वे दो दिन आ जाते थे। हालांकि उन्होंने कहा कि वे अब शराब नहीं पीएंगे।
जेंडर एक्सपर्ट डॉ. स्मृति सिंह के मुताबिक, महिला समाख्या के सामने सरोजनीनगर व मोहनलालगंज के कुछ मामले आए थे। महिला समाख्या ने 19 जिलों में 38 ब्लॉक में नारी अदालत की सदस्यों से रैपिड सर्वे कराया। सर्वे में 3800 और परिवारों से बात की गई। उन्होंने शराब बंदी को लॉकडाउन का सबसे बड़ा फायदा बताया।
सुरक्षा व नॉन फॉरमल एजुकेशन सेंटर की काउंसलर डॉ. स्वर्णिमा सिंह ने कहा, लखनऊ के लोनापुर, गांधीनगर, उजरियांव, कनार, महमूदनगर, औरंगाबाद सेंटर से जुड़ी महिलाओं से टेलीफोनिक काउंसििलंग जारी है। बच्चों और महिलाओं ने बताया, इस एक माह में जैसी खुशहाल जिंदगी उन्होंने जी, वैसी कभी नहीं रही।
पारिवारिक परामर्श केंद्र सुरक्षा की सचिव डॉ. शालिनी माथुर कहती हैं कि हम हर माह करीब 100 केसों की काउंसलिंग करते हैं और पिछले 35 साल का अनुभव है कि इनमें से 50 फीसदी केस शराब के कारण रजिस्टर्ड होते हैं। लॉकडाउन के रुझान बता रहे थे कि शराब न मिलने से परिवार खुश थे।