प्राथमिक स्कूल के बच्चे भी अंग्रेजी में बात कर सकते हैं। उनकी आंखों में भी पलने लगे हैं सपने चांद-तारे छूने के। वैज्ञानिक बनकर विज्ञान की दुनिया के राज जानने की जिज्ञासा उनमें भी है और लैपटॉप, कम्प्यूटर के बारे में वे बड़े आत्मविश्वास सेे बताने लगे हैं कि ‘इट इज एन इलेक्ट्रॉनिक मशीन’। सुखद बदलाव की ये बयार बह रही है लखनऊ के उन सरकारी प्राथमिक स्कूलों में जहां कभी बच्चे सिर्फ मीड डे मील लेने के बहाने ही जाया करते थे या फिर टाट-पट्टी पर कभी-कभी इक्का दुक्का बच्चा नजर आ जाता था, वरना टीचरों का सारा समय धूप सेंकते या फिर हथपंखा झलते ही बीतता था। इस बदलाव के सूत्रधार हैं इन स्कूलों के शिक्षक, जो बच्चों में रचनात्मक सोच पैदा करने का न केवल आत्मविश्वास रखते हैं, बल्कि उन्होंने ऐसा कर दिखाया है। ऐसे ही कुछ शिक्षकों की कोशिशों को हम नमन करते हैं शिक्षक दिवस पर।
शिक्षक दिवस पर नमन उन शिक्षकों को जो बने बदलाव के सारथी, बोले ...ताकि किसी से कम न हों हमारे बच्चे
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- अजिता सिंह, हेड टीचर, इंग्लिस मीडियम प्राइमरी स्कूल सिकंदरपुर अमोलिया, गोसाईंगंज
गोसाईंगंज ब्लॉक का सबसे जर्जर, सबसे खराब स्कूल आज एक मिसाल बन चुका है। जिस स्कूल में 25-30 बच्चे ही जाते थे, आज वहां 140 बच्चों की उपस्थिति होती है। स्कूल की हर दीवार चमकती है। बच्चों का अपना एक अनूठा प्ले ग्राउंड है, जहां टायर से बने झूले लगे हैं। यहां बच्चों का दीक्षांत समारोह होता है, पीटीएम (पैरेंट्स टीचर्स मीटिंग) भी होती है। यह सब यहां की हेड टीचर अजिता सिंह की कोशिशों का नतीजा है। कहती हैं कि हम चार स्तरीय विधि से पढ़ाते हैं। इसके तहत हम बच्चों के अलग-अलग ग्रुप उनकी उम्र, उनके नॉलेज उनकी सक्रियता के आधार पर बनाते हैं। पहला ग्रुप जिसमें अक्षर ज्ञान कराया जाता है, दूसरा शब्द ज्ञान, तीसरा वाक्य और चौथे ग्रुप में वे बच्चे होते हैं, जो बिल्कुल पढ़ना नहीं चाहते। हम उन्हें कहानियां सुना-सुनाकर रोकते हैं। अजिता कहती हैं कि बच्चों की उम्मीदों को पंख देना जरूरी है, इसके लिए हमें माता-पिता की लगातार काउंसलिंग करते रहना होगा।
मेरी उम्मीदः एक किताब, एक कलम, एक बच्चा और एक शिक्षक दुनिया को बदल सकता है।
बेटियों की शिक्षा को दी एक राह
- आशीष चंद्र, साइंस टीचर, प्राथमिक विद्यालय हसनापुर, माल
हसनापुर मुस्लिम बाहुल्य घनी आबादी वाला गांव है, जिसमें जरदोजी ही जीवकोपार्जन का साधन है। यहां घर-घर काम होता है, इसलिए बच्चों को खासकर बेटियों को स्कूल लाना एक बड़ी चुनौती थी। घंटी-बजाओ, हाजिरी बढ़ाओ जैसे अभियान चलाने वाले इस विद्यालय के टीचर आशीष चंद्र ने इस गांव में बेटियों की शिक्षा को एक नई राह दी। नाजरीन नामक एक बच्ची के दाखिले के साथ ही उन्होंने धीरे-धीरे सबको प्रेरित किया और आज इस विद्यालय की संख्या 103 पहुंच गई। इतना ही नहीं हसनापुर की बेटियां स्नातक तक की डिग्री ले रही हैं। अपने विद्यालय को स्मार्ट स्कूल बनाने वाले आशीष कहते हैं कि हमारे यहां स्मार्ट क्लास है, जहां विज्ञान के कठिन हिस्से को फिल्म के माध्यम से समझाते हैं। प्रश्नोत्तरी को पीपीटी के जरिए रोचक बनाया है। कम्प्यूटर लैब के साथ-साथ हम एलुमिनी मीट भी करते हैं।
मेरा विश्वासः एक अच्छा शिक्षक आशा को जगाता है कल्पना को प्रज्जवलित करता है और सीखने का प्यार बढ़ाता है।
बच्चों की आंखों में भर दिए दुनिया भर के ख्वाब
- नंदिनी राठौर, प्रधानाध्यापिका, प्राथमिक विद्यालय राजापुर, बीकेटी
2007 में असिस्टेंट टीचर फिर 2013 से अब तक प्रधानाध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं नंदिनी राठौर। ये 2ई प्लस 2सी के फार्मूले पर काम कर रही हैं। मसलन बच्चों के मनोवैज्ञानिक पक्ष को मजबूत बनाने के लिए इन्होंने शुरुआत की इंट्रोडक्शन सेशन से, जिसमें बच्चों को माइक पर अपने बारे में बोलना सिखाया जाता है। इसके बाद बारी थी कम्युनिटी कनेक्शन की, जिसमें इन्होंने माता-पिता और गांव वालों के सामने बच्चों की प्रतिभा को रखा। यहीं पर बच्चों का माता-पिता और ग्रामीणों के साथ और उन सबका टीचर के साथ इमोशनली कनेक्शन डवलप हुआ। इसने स्कूलों में बच्चों की संख्या 84 तक लाने में मदद की। पहले यह संख्या महज 36, फिर 47, 71 और 77 हुआ करती थी। अब बारी थी बच्चों के स्मार्ट एक्सपोजर की। जैव विविधता पर बच्चों के साथ एक प्रोजेक्ट बनाया। स्टेट और नेशनल लेवल पर उसे प्रस्तुत किया। जो बच्चे कभी ट्रेन में नहीं बैठे थे उन्हें जब इसी प्रोजेक्ट के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला तो वे हवाई जहाज की यात्रा पर गए। लौट कर आने के बाद किसी की आंखों में था सपना एयर होस्टेस बनने का तो कोई बनना चाहता था साइंटिस्ट। नंदिनी कहती हैं कि ये बच्चे किसी की दया का पात्र क्यों बनें। इनमें आत्मविश्वास देख मैं गर्व से कह सकती हूं कि इनमें खुद को देखने लगी हूं मैं।
मेरी सोच : सच्चे शिक्षक वे हैं जो हमें अपने लिए सोचने में सहायता करते हैं।
सुरभि शर्मा, असिस्टेंट टीचर, प्राथमिक विद्यालय स्कूटर इंडिया, सरोजनीनगर
अंग्रेजी ही सब कुछ नहीं, लेकिन शैक्षिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा जरूर बन चुकी है। प्राथमिक स्कूल के बच्चे अंग्रेजी तो दूर हिंदी ही ठीक से पढ़ लें, यही बहुत था। पर प्राथमिक विद्यालय स्कूटर इंडिया में बच्चे इंग्लिश प्ले करते हैं और वे अंग्रेजी में बात भी करना सीख गए हैं। हालांकि उन्हें परफेक्ट बनाना बाकी है। यह कहते हुए विद्यालय की असिस्टेंट टीचर सुरभि शर्मा की आंखें गर्व से चमक उठती हैं। वे सात साल से इस स्कूल में है और 230 बच्चे इस स्कूल का हिस्सा है। सबसे बड़ी चुनौती थी बच्चों के माता-पिता। पहले स्कूल नहीं भेजते थे। इसके लिए राजी तो हो गए लेकिन बच्चों के लिए की जाने वाली हर नई चीज का विरोध करते। हमने हर घर दस्तक दी, उनसे बात की और हालात बदल गए। आज इस स्कूल के बच्चे ज्यादातर सरकारी सांस्कृतिक आयोजनों में बेहतर प्रस्तुति देते हैं। पपेट बनाने के साथ-साथ कागज की लुगदी से ढेरों चीजें बनाना जानते हैं। यह उनके कौशल विकास का हिस्सा है। सुरभि कहती हैं कि अंतरस्कूल प्रतियोगिताएं तो बच्चे जीत रहे हैं, अब हमारी कोशिश है कि नवोदय में इनमें से कुछ का ही सही एडमिशन हो जाए।
मेरा आदर्श वाक्य : रचनात्मक अभिव्यक्ति और ज्ञान में प्रसन्नता जगाना शिक्षक की सर्वोत्तम कला है।