लखनऊ पुलिस का इतिहास रोमांचक किस्सों और जांबाजी से भरा हुआ है। यहां के अनेक पुलिस अफसर अपने काम से सुर्खियों में रहे और नागरिकों का विश्वास जीता। इस कॉलम में हम आपको ऐसे ही ‘अलग बात’ वाले वर्दीवालों से परिचित कराते हैं। 20 साल पहले राजधानी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे रजनीकांत मिश्र को अपराधियों पर नकेल कसने में लोग आज भी याद करते हैं।
1984 बैच के आईपीएस रजनीकांत मिश्र ने 12 जुलाई 1998 को राजधानी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनने के बाद पहली अपराध समीक्षा बैठक में एक सिपाही-एक बदमाश का फॉर्मूला लागू किया। सभी थानों व चौकियों पर तैनात सिपाहियों को एक-एक अपराधी की कुंडली तैयार करने के साथ उसकी गतिविधियों पर नजर रखने का जिम्मा सौंपा।
इसके बाद उन्होंने रोजाना प्रत्येक थाने से एक सिपाही को अपने कार्यालय में तलब कर अपराधी की गतिविधियों के साथ परिवार, रिश्तेदार, जमानतदार, वकील, मुकदमों की स्थिति की जानकारी लेकर जिले भर के अपराधियों का डाटा बैंक तैयार कराया। सीधे वार्तालाप से कुछ ही दिनों में सभी सिपाहियों के बारे में जानकारी हो गई।
पुलिसकर्मियों की परेशानियों से भी वह वाकिफ हुए। अपराधियों पर नकेल कसने के साथ उन्होंने मातहतों की दिक्कतें दूर करने के लिए कदम उठाए। पुलिस मुख्यालय से पत्राचार करके शव को रिक्शे पर लादकर मॉर्च्युरी ले जाने की प्रथा खत्म कराई और हवालात में बंद अपराधियों के भोजन का भत्ता बढ़वाया।
सिपाहियों ने ही कर दिया एनकाउंटर
अपराधियों के प्रति कप्तान की सख्ती के चलते जिलेभर के सिपाही मुस्तैद हो गए। नाका इलाके में सिपाहियों ने ही दिनदहाड़े मुठभेड़ में एक बदमाश को मार गिराया। आतंक फैलाए बदमाश के खात्मे पर नागरिकों ने सिपाहियों को गोद में उठाकर जुलूस निकाला था।