‘मुगल-ए-आजम’, ‘बैजू बावरा’ सहित जिनके संगीत से सजी 26 फिल्मों ने सिल्वर जुबली, नौ ने गोल्डन और तीन ने प्लेटिनम जुबली का रिकॉर्ड बना दिया। संगीत की दुनिया में बुलंदियों पर पहुंचा यह शख्स कभी इसी शहर में लालबाग के कंधारी लेन गली में घूमा करता था।
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संगीतकार नौशाद
- फोटो : डेमो
बाप मुंशी वाहिद अली गाना-बजाने का काम उठाईगीरों का मानते थे। बात किसी और की नहीं बल्कि संगीत के बादशाह नौशाद की हो रही है। उनके मामू अल्लन साहब की हारमोनियम व तबला मरम्मत की दुकान थी। नौशाद की जीवनी ‘जर्रा जो आफताब बना’ लिखने वाले चौधरी जिया इमाम बताते हैं, नौशाद अमीनाबाद में रॉयल टॉकीज के बाहर खड़े होकर घंटों गाना सुना करते।
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संगीतकार नौशाद
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एक दिन मामू नौशाद को देवा मेला ले गए। नौशाद को वहां बांसुरी बजा रहे एक शख्स ने काफी प्रभावित किया। इतना कि अमीनाबाद हाईस्कूल की कक्षाएं छोड़कर देवा चले जाते और बांसुरी वाले से बांसुरी सुना करते थे।
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संगीतकार नौशाद
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संगीत से लगाव के कारण वह लखनऊ में भी अक्सर श्रीराम रोड पर उस समय वाद्य यंत्रों की बड़ी दुकान ‘भोंदू एंड कंपनी’ के बाहर घंटों खडे़ होकर वाद्य यंत्रों को निहारा करते। नौशाद का यह रोज का सिलसिला था। एक दिन दुकान मालिक गुरबत अली ने पूछ ही लिया, ‘बेटा! तुम क्या करते हो?’
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संगीतकार नौशाद
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नौशाद ने जवाब दिया, ‘कुछ नहीं बस यूं ही घूमा करता हूं।’ दुकान मालिक ने पूछा, ‘काम करना चाहते हो?’ नौशाद ने बिना सोचे-समझे हां कर दी।’ गुरबत अली ने दुकान की सफाई का काम सौंप दिया। चोरी-छिपे वह दुकान की हारमोनियम पर भी अभ्यास करने लगे।