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भारत माता की रक्षा के लिए बीमार पत्नी की भी नहीं की परवाह, नौ साल की शादी में केवल चार बार आए घर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 24 Jul 2018 07:28 PM IST
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लांसनायक केवलानंद द्विवेदी
- फोटो : amarujala
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कारगिल में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी ऐसे नायक हैं, जो अपनी बीमार पत्नी को छोड़कर रणभूमि में गए थे। खास बात यह है कि उनकी बीमार पत्नी ने उनका हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि सरहदों को आपकी ज्यादा जरूरत है। वह मां है। मां की सुरक्षा पहले। देशसेवा पहले। पर, उन्हें क्या पता था कि वह खुद नहीं आएंगे, युद्घभूमि से उनकी शहादत की खबर आएगी।
लांसनायक केवलानंद द्विवेदी
- फोटो : amarujala
शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी का जन्म 12 जून 1968 को पिथौरागढ़ में हुआ। दो भाइयों में वे बड़े थे। उनके पिता ब्रह्मदत्त द्विवेदी सेना में सूबेदार थे। उनकी ख्वाहिश थी कि दोनों बेटे फौज में भर्ती हों। पर, केवलानंद ही उनकेसपने को पूरा कर सके। लांसनायक के परिवार में बड़ा बेटा हेमचन्द है, जिसने प्रबंधन की पढ़ाई की है और छोटा बेटा तीरथ कम्प्यूटर क्षेत्र में है। शहीद की ख्वाहिश थी कि फौज के जरिए देश की सेवा का जज्बा उनके परिवार में बना रहे और परिवार के अन्य लोग भी देश का नाम रोशन करें।
लांसनायक केवलानंद द्विवेदी (फाइल फोटो)
- फोटो : amarujala
लांसनायक कारगिल सेक्टर में दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए आगे बढ़ रहे थे कि ऊंचाई पर बैठे दुश्मन की एक गोली उनके सीने में धंस गई। पर, उनके कदम नहीं रुके। अंतिम सांस तक उन्होंने दुश्मनों का सामना किया और शहीद हो गए। 6 जून, 1999 को उनकी शहादत की खबर परिवार को मिली। उनकी शहादत से परिवार टूट गया। मां अचानक से बीमार पड़ गईं। बीमारी में भी वो इनका नाम जपा करती थीं। उन्हें अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती करवाया गया, पर कुछ ही दिनों में वह भी चल बसीं।
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लांसनायक की पत्नी कमला
- फोटो : amarujala
नौ साल की शादी में चार बार आए घर...
शहीद लांसनायक केवलानंद की शादी 1990 में हुई थी। उस वक्त वह 22 साल के थे और उनकी पत्नी कमला द्विवेदी सिर्फ बीस साल की। चूंकि, सरहद की सुरक्षा में वह बेहद व्यस्त रहते थे। छुट्टियां भी बहुत कम मिलती थीं। इसलिए शादी के बाद केवल चार बार ही घर आए थे।
शहीद लांसनायक केवलानंद की शादी 1990 में हुई थी। उस वक्त वह 22 साल के थे और उनकी पत्नी कमला द्विवेदी सिर्फ बीस साल की। चूंकि, सरहद की सुरक्षा में वह बेहद व्यस्त रहते थे। छुट्टियां भी बहुत कम मिलती थीं। इसलिए शादी के बाद केवल चार बार ही घर आए थे।
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लांसनायक केवलानंद द्विवेदी
- फोटो : amarujala
नहीं मिला उचित सम्मान
शहीद के परिवारीजनों को हमेशा इस बात की तकलीफ रही कि जिस लांसनायक केवलानंद ने देश को सब कुछ मानकर जान न्यौछावर कर दी, उनके परिवारीजनों के साथ सरकारों ने बड़ी नाइंसाफी की। सरकारी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हुईं। इतना ही नहीं शहादत के बाद सरकार ने नौकरी से लेकर जो भी वादे किए थे, वे सब अधूरे हैं। पत्नी कमला का कहना है कि जैसे-तैसे परिवार का खर्च चलाकर बेटों तीरथराज व हेमचंद को पढ़ाया। सरकार ने भले ही हमारी उपेक्षा की हो, पर मेरा ख्वाब अपने बच्चों को सेना में ही भेजने का है।
शहीद के परिवारीजनों को हमेशा इस बात की तकलीफ रही कि जिस लांसनायक केवलानंद ने देश को सब कुछ मानकर जान न्यौछावर कर दी, उनके परिवारीजनों के साथ सरकारों ने बड़ी नाइंसाफी की। सरकारी सुविधाएं तक मयस्सर नहीं हुईं। इतना ही नहीं शहादत के बाद सरकार ने नौकरी से लेकर जो भी वादे किए थे, वे सब अधूरे हैं। पत्नी कमला का कहना है कि जैसे-तैसे परिवार का खर्च चलाकर बेटों तीरथराज व हेमचंद को पढ़ाया। सरकार ने भले ही हमारी उपेक्षा की हो, पर मेरा ख्वाब अपने बच्चों को सेना में ही भेजने का है।