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यहां पढ़ें कारगिल के ऐसे जांबाज की कहानी, जो लहूलुहान होकर भी बिछाते रहे सिग्नलिंग के तार

Tue, 24 Jul 2018 07:27 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 24 Jul 2018 07:27 PM IST
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story of kargil shaheed aditya mishra
शहीद कैप्टन आदित्य मिश्रा (फाइल फोटो) - फोटो : amarujala
कैप्टन आदित्य मिश्र का नाम कारगिल युद्ध के ऐसे जांबाजों में शामिल है, जो युद्ध भूमि में बतौर सैन्य अधिकारी गए, पर हीरो बनकर लौटे। शहादत देकर देश की रक्षा की। ऑपरेशन विजय में लखनऊ के कैप्टन आदित्य मिश्र का योगदान अभूतपूर्व व अविस्मरणीय है। 
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शहीद कैप्टन आदित्य मिश्रा (फाइल फोटो)
आठ जून, 1996 को सेना के सिग्नल कोर में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में कैप्टन आदित्य मिश्र भर्ती हुए थे। सितंबर, 1999 में उन्हें लद्दाख स्काउट में तैनाती मिली। इसके बाद जब कारगिल युद्ध छिड़ा तो वह बटालिक पहुंचे, जहां 17 हजार फीट ऊंची चोटी पर भारतीय पोस्ट को छुड़ाने के लिए उन्होंने दुश्मनों पर हमला कर दिया। साथ में राइफलमैन सुनील जंग और लांसनायक केवलानंद द्विवेदी ने ऊंची पहाड़ियों पर कोहनी के बल चढ़ाई की, जहां सांस लेना भी मुश्किल था। 
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शहीद कैप्टन आदित्य मिश्रा (फाइल फोटो) - फोटो : amarujala
काफी मशक्कत के बाद उन्होंने दुश्मनों का खात्मा कर चोटी पर फतह हासिल कर ली। चूंकि, पोस्ट पर कम्युनिकेशन के लिए तार बिछाने बहुत जरूरी थे, इसलिए वह पोस्ट से नीचे उतर आए, पर जब वह दोबारा पोस्ट पर गए तो वहां दुश्मन काबिज हो चुके थे। दुश्मनों की गोलीबारी में वह घायल हो गए। उन्होंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और पोस्ट को दुश्मनों से खाली करवाया। वहां सिग्नलिंग के तार बिछाने के बाद वीरगति को प्राप्त हुए।
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शहीद कैप्टन आदित्य मिश्रा (फाइल फोटो) - फोटो : amarujala
परंपरा को आगे बढ़ाया
कैप्टन आदित्य मिश्र के पिता जीएस मिश्र सीनियर आमी ऑफिसर रहे हैं। वहीं आदित्य मिश्र की पढ़ाई कैथेड्रल व चिल्ड्रेन अकादमी से हुई और इसी दौरान सेना में जाने का मन बना लिया था। परिजनों को कैप्टन आदित्य मिश्र की शहादत पर फख्र है। पर, कहीं एक इंच भी जमीन पाकिस्तानियों के हाथ चली जाती तो उसका मलाल जिंदगी भर रहता। आदित्य मिश्र 24 दिसंबर, 1974 को पैदा हुए थे और खेलकूद से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक में उनकी खासी रुचि रहती थी।
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शहीद कैप्टन आदित्य मिश्रा (फाइल फोटो) - फोटो : amarujala
‘मां, मैं दुश्मनों को अपनी गोलियों से छलनी कर दूंगा। एक-एक बुलेट उनके शरीर में उतार दूंगा। पर, आखिरी बुलेट अपने लिए बचाकर रखूंगा ताकि पाकिस्तानियों द्वारा पकड़ा ना जा सकूं।’
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