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155 वर्ष पुराना है ये काली बाड़ी मंदिर, यहां बलि देने की है अनोखी प्रथा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Thu, 11 Oct 2018 04:30 PM IST
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काली बाड़ी मंदिर
- फोटो : amar ujala
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लखनऊ के कैसरबाग में कैंट रोड को जाने वाली सड़क पर शुभम सिनेमा के सामने मुड़ती गली के भीतर मौजूद है नगर का सबसे पुराना काली बाड़ी मंदिर। जहां मां बंगाली परंपरा के अनुसार अगस्त, 1863 से सिद्ध पीठ के रूप में विराजमान है। मंदिर की स्थापना 155 साल पहले बांग्लभाषियों ने की थी। काली बाड़ी मंदिर टेम्पल ट्रस्ट की ओर से घसियारी मंडी स्थित काली बाड़ी मंदिर की 155वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।
काली बाड़ी मंदिर
- फोटो : amar ujala
शारदीय नवरात्र में यहां महिषासुर मर्दिनी का विशेष पाठ होता है। भक्त मधुसूदन बनर्जी ने सपने में मां के आदेश के बाद उन्होंने खुद मिट्टी की प्रतिमा तैयार कर स्थापित की थी। स्थापना पांव जीवों के मुंड पर तत्कालीन समय में स्थापित की थी। जब मां की स्थापना हो रही थी तब सांप, नेवला, वानर, एक पक्षी समेत कुल पांच जीवों के मुंडों की आधारशिला पर मां की स्थापना हुई।
काली बाड़ी मंदिर
- फोटो : amar ujala
यह अपनी तरह का अकेला मंदिर है जहां कभी बलि दिया जाया करती थी। यहां हर शारदीय नवरात्र की नवमी पर परंपरागत रूप से जीवित बलि की प्रथा का चलन लंबे समय तक रहा, मंदिर के अध्यक्ष गौतम भट्टाचार्य बताते हैं कि अब अरसे से यहां बलि पूरी तरह से वर्जित है। महानवमी पर यहां परंपरागत रूप से हवन पूजन के बाद अब जीवित बली के स्थान पर पंच फलों की बलि मां के सामने बने कुंड में दी जाती है।
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काली बाड़ी मंदिर
- फोटो : amar ujala
शारदीय नवरात्र से पहले यहां महालया होता है। हर बांग्ला उत्सव के दौरान यहां आयोजन होते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान केवल इसी मंदिर में ढाक वादन की प्रतियोगिता भी होती है। जो शहर में अपने आप में एक खास होती है। इसमें कई ढाकियों के दल ढाक वादन करते हैं।
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काली बाड़ी मंदिर
- फोटो : amar ujala
मंदिर का संचालन ट्रस्ट करता है। मौजूदा समय में तीन पुरोहित मां की सेवा में लगे हैं। शारदीय नवरात्र के दौरान यहां मंदिर जाने वाले रास्तों पर कोलकाता चंदरनगर की सजीली लाइटों से सजे द्वार भी नगर में अनोखे ही रहते हैं।