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इन अफसर के सख्त व्यवहार पर चुटकी लेते थे साथी, आचार संहिता हटते ही कप्तान का बंध जाएगा बिस्तर

Thu, 09 Aug 2018 04:39 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 09 Aug 2018 04:39 PM IST
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story of IPS jyoti narayan
आईपीएस ज्योति नारायण - फोटो : amarujala
लखनऊ पुलिस का इतिहास कई रोमांचक किस्सों और जांबाजी से भरा हुआ है। यहां के अनेक पुलिस अफसर अपने काम से सुर्खियों में रहे और नागरिकों का विश्वास जीता। इस कॉलम में हम आपको ऐसे ही ‘अलग बात’ वाले वर्दी वालों से परिचित कराते हैं। इनमें ज्योति नारायण की अलग पहचान है। नागरिकों से मधुर व्यवहार और रिश्वतखोरों के लिए कड़क मिजाज के चलते उनके 54 दिन के कार्यकाल को लोग याद करते हैं। 
story of IPS jyoti narayan
यूपी पुलिस
वर्ष 2007 में चुनाव की घोषणा के बाद निर्वाचन आयोग ने कड़क मिजाज के लिए चर्चित आईपीएस अफसर ज्योति नारायण को राजधानी का कप्तान बनाया। उस दौरान पुराने शहर में तनातनी का माहौल था। लखनऊ पुलिस की कमान संभालते ही ज्योति नारायण ने चुनाव में शांति व्यवस्था की तैयारी के साथ पुराने शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखने को सुबह से लेकर देर रात तक भ्रमण किया।
story of IPS jyoti narayan
डेमो - फोटो : डेमो
इस दौरान वह थाने, चौकी और पुलिस बूथ पर बैठकर न सिर्फ कानून व्यवस्था का जायजा लेते, बल्कि नागरिकों की शिकायतें सुनकर उन पर कार्रवाई कराते थे। आलम यह था कि लोग अपनी शिकायत लेकर कप्तान के दफ्तर व आवास के चक्कर काटने के बजाय अपने इलाके में नजर लगाए रहते थे। कप्तान की गाड़ी गुजरते ही थाने या चौकी पर पहुंच जाते थे। जनता की शिकायतों की हरवक्त सुनवाई करने वाले ज्योति रिश्वतखोरों के प्रति काफी सख्त थे।
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डेमो
उनकेे मिजाज से वाकिफ पुलिसकर्मी घूस लेने से परहेज करने लगे, लेकिन साथ में चुटकी लेते कि आचार संहिता हटते ही कप्तान का बिस्तर बंध जाएगा। और हुआ भी वही, तैनाती के 54 वें दिन प्रदेश में बसपा की सरकार बनने के साथ जारी हुई आईपीएस के तबादलों की सूची में ज्योति नारायण का नाम था। उन्हें बरेली भेजा गया था। 
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आईपीएस ज्योति नारायण - फोटो : amarujala
सिफारिश पर चढ़ता था पारा 
ज्योति नारायण अपने दफ्तर और कैंप ऑफिस में पहुंचे पीड़ित की सीधी सुनवाई करके उसे इंसाफ दिलाने का प्रयास करते थे, लेकिन कोई सिफारिश आने पर उनका पारा चढ़ जाता था। पुलिस अफसरों पर काम के लिए दबाव बनाने वाले नेता उन्हें फोन नहीं करते थे। उच्चाधिकारी भी उनके काम में दखलंदाजी से हिचकते थे। 
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