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साहस है तो कैंसर से भी जीत है... , जानिए इन विजेताओं की कहानी जो दूसरों को दे रहे हौसला
Tue, 22 Sep 2020 01:01 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Tue, 22 Sep 2020 01:01 PM IST
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मानसी, आकृति, शशांक
- फोटो : amar ujala
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ब्लड कैंसर से पीड़ित कनाडा की 12 साल की बच्ची मेलिंडा रोज ने कैंसर पीड़ितों की जिंदगी में खुशियां फैलाने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उसे सम्मान देते हुए हर साल 22 सितंबर को वर्ल्ड रोज डे मनाया जाता है। यह दिन प्रतीक है कैंसर से जूझ रहे लोगों के जीवन में नई आशाओं के संचार करने का। आइए हम सलाम करें शहर के उन युवाओं को, जिन्होंने कैंसर से जंग लड़ी और आज कैंसर पीड़ित बच्चों को खुशी के दो पल देने का प्रयास कर रहे हैं।
शशांक
- फोटो : अमर उजाला
12 सर्जरी, 26 कीमो ने मुझे और मजबूत कर दिया
मेरा नाम शशांक है। मेरी उम्र 21 साल है और मुझे न्यूरोफाइब्रोसारकोमा हुआ था। 26 कीमोथेरेपी और 12 सर्जरी हो चुकी है। 12 साल की उम्र में मुझे कैंसर हुआ। मेरे इलाज में पापा की नौकरी चली गई। मैं आर्मी ज्वॉइन करना चाहता था, पर सर्जरी के कारण ऐसा संभव नहीं। मैं इस वक्त केजीएमयू में पीडियाट्रिक आंकोलाजी में बतौर असिस्टेंट सोशल वर्कर काम कर रहा हूं। मेरी जिंदगी का मकसद हर माता-पिता तक यह संदेश पहुंचाना है कि बच्चों को होने वाला कैंसर लाइलाज नहीं। मैं यहां भर्ती बच्चों के माता-पिता की काउंसलिंग से लेकर बच्चों के भीतर से बीमारी का डर निकालता हूं।
मेरा नाम शशांक है। मेरी उम्र 21 साल है और मुझे न्यूरोफाइब्रोसारकोमा हुआ था। 26 कीमोथेरेपी और 12 सर्जरी हो चुकी है। 12 साल की उम्र में मुझे कैंसर हुआ। मेरे इलाज में पापा की नौकरी चली गई। मैं आर्मी ज्वॉइन करना चाहता था, पर सर्जरी के कारण ऐसा संभव नहीं। मैं इस वक्त केजीएमयू में पीडियाट्रिक आंकोलाजी में बतौर असिस्टेंट सोशल वर्कर काम कर रहा हूं। मेरी जिंदगी का मकसद हर माता-पिता तक यह संदेश पहुंचाना है कि बच्चों को होने वाला कैंसर लाइलाज नहीं। मैं यहां भर्ती बच्चों के माता-पिता की काउंसलिंग से लेकर बच्चों के भीतर से बीमारी का डर निकालता हूं।
आकृति चौहान
- फोटो : amar ujala
...ताकि कोई बच्चा अवसाद से न घिरे
मेरा नाम आकृति चौहान है। मुझे 14 साल की उम्र में ब्लड कैंसर हुआ। इलाज हुआ, ठीक हुई, लेकिन शारीरिक के साथ-साथ मानसिक पीड़ा असहनीय थी। मेरे बाल, आइब्रो भी कीमो के कारण झड़ गए थे। लोग मुझ पर हंसे भी। मैंने ग्रेजुएशन प्राइवेट पूरा किया। केजीएमयू में कैनकिड्स संस्था ने मुझे जॉब दी। लखनऊ में 150 बच्चों का एक ग्रुप है जहां हम दर्द साझा करते हैं, हंसते हैं, खेलते हैं और बीमारी से लड़ने का हौसला पाते हैं।
मेरा नाम आकृति चौहान है। मुझे 14 साल की उम्र में ब्लड कैंसर हुआ। इलाज हुआ, ठीक हुई, लेकिन शारीरिक के साथ-साथ मानसिक पीड़ा असहनीय थी। मेरे बाल, आइब्रो भी कीमो के कारण झड़ गए थे। लोग मुझ पर हंसे भी। मैंने ग्रेजुएशन प्राइवेट पूरा किया। केजीएमयू में कैनकिड्स संस्था ने मुझे जॉब दी। लखनऊ में 150 बच्चों का एक ग्रुप है जहां हम दर्द साझा करते हैं, हंसते हैं, खेलते हैं और बीमारी से लड़ने का हौसला पाते हैं।
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मानसी रावत
- फोटो : amar ujala
टीचर बनकर बनूंगी सबका सहारा
मेरा नाम मानसी रावत है। बीकेटी के नगवामऊ गांव में रहती हूं। इस वक्त 11वीं की छात्रा हूं। मैं बहुत छोटी थी, जब मुझे कैंसर हुआ। मेरा कैंसर शरीर के अंदर था, इसलिए बुरा नहीं लगा। बीच में पढ़ाई रुक गई थी, पर केजीएमयू में ईश्वर चाइल्ड वेलफेयर फाउंडेशन की सपना मैम ने मम्मी की मदद की। मेरा इलाज हो सका और अब मुझे टीचर बनना है, ताकि मैं लोगों का सहारा बन सकूं।
मेरा नाम मानसी रावत है। बीकेटी के नगवामऊ गांव में रहती हूं। इस वक्त 11वीं की छात्रा हूं। मैं बहुत छोटी थी, जब मुझे कैंसर हुआ। मेरा कैंसर शरीर के अंदर था, इसलिए बुरा नहीं लगा। बीच में पढ़ाई रुक गई थी, पर केजीएमयू में ईश्वर चाइल्ड वेलफेयर फाउंडेशन की सपना मैम ने मम्मी की मदद की। मेरा इलाज हो सका और अब मुझे टीचर बनना है, ताकि मैं लोगों का सहारा बन सकूं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : amar ujala
आज सुनहरे रंग से जगमगाएगी इमारत
कैंसर पीड़ित बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था कैनकिड की प्रोजेक्ट मैनेजर प्रीति रस्तोगी ने बताया कि 22 सितंबर का दिन खास है। इस दिन केजीएमयू में पीडियाट्रिक आंकोलाजी की इमारत को सुनहरी लाइटों से सजाया जाएगा।
कैंसर पीड़ित बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था कैनकिड की प्रोजेक्ट मैनेजर प्रीति रस्तोगी ने बताया कि 22 सितंबर का दिन खास है। इस दिन केजीएमयू में पीडियाट्रिक आंकोलाजी की इमारत को सुनहरी लाइटों से सजाया जाएगा।