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टीबी चैंपियनों की कहानी बयां करती एक रिपोर्ट, बोले- पहले लोग हंसते थे अब लेते हैं सलाह

Fri, 01 Nov 2019 04:47 PM IST
ishwar ashish चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Fri, 01 Nov 2019 04:47 PM IST
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report on stories of TB champions in lucknow
टीबी मरीज - फोटो : अमर उजाला

टीबी से डरने की नहीं बल्कि लड़ने की जरूरत है। सामुदायिक भागीदारी से ही 2025 तक भारत को टीबी मुक्त बनाने का सपना साकार होगा। इसमें हर व्यक्ति को सहयोगी बनना होगा। कुछ ऐसा ही संदेश दे रहे हैं प्रदेश के टीबी चैंपियन। कभी ये खुद टीबी से ग्रसित थे और जिंदगी से निराश हो चुके थे, लेकिन नियमित दवाओं का सेवन कर खुद को टीबी मुक्त कर लिया। वे चाहते हैं कि टीबी की गिरफ्त में आए दूसरे लोग भी इससे निजात पाएं। इसी उद्देश्य के साथ वे समाज में जागरूकता फैला रहे हैं। प्रदेश के विभिन्न भागों में रह रहे टीबी चैंपियनों की कहानी बयां करती एक रिपोर्ट :

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मेहरुन्निशा - फोटो : अमर उजाला

पहले लोग हंसते थे, अब लेते हैं सलाह
चित्रकूट जिले के मछलीमंडी निवासी मेहरुन्निशा को दो साल पहले लगातार खांसी आने लगी। जांच में टीबी की पुष्टि हुई तो परिवार और पड़ोस के लोग हिकारत भरी निगाह से देखने लगे। वह डाट्स पर गईं और वहां से नियमित दवाएं लेने लगीं। मई 2018 की जांच में उन्हें टीबी मुक्त घोषित कर दिया गया। उन्होंने टीबी मरीजों का दर्द सुनकर संकल्प लिया था कि बच गईं तो दूसरों को मरने नहीं दूंगी। अब मानिकपुर पहाड़ी पर रहने वाले टीबी मरीजों के बीच काम कर रही हैं। उन्हें स्वास्थ्य विभाग ने टीबी चैंपियन के नाम से सम्मानित किया। इसके बाद उन्होंने अपना दायरा बढ़ाया। पहाड़ तोड़ाई के काम में लगे मजदूरों की हर तीन से चार माह में डाट्स ले जाकर जांच कराती हैं। मेहरुन्निशा बताती हैं कि शुरुआती दौर में उनके काम पर लोग हंसते थे, लेकिन अब सलाह लेने आते हैं।

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कमल कुमार - फोटो : अमर उजाला

खत्म करना होगा लोगों के मन का डर
राजधानी के सरोजनी नगर ब्लॉक के मवई पड़ियाना निवासी कमल कुमार को 2012 में लगातार खांसी आने, सीने में दर्द की शिकायत हुई। निजी अस्पताल के डॉक्टर ने यह नहीं बताया कि टीबी है। वह दवा देने लगे। परचून की दुकान चलाने वाले कमल के लिए हर हफ्ते पांच से सात सौ की दवा का खर्च उठाना मुश्किल होने लगा। इसके बाद वह टीबी अस्पताल ठाकुरगंज गए। जहां जांच में टीबी की पुष्टि हुई। फिर घर से चंद कदम दूर सरोजनी नगर स्थित सेंटर भेज दिया गया। वहां मुफ्त दवाएं मिलीं। सालभर में ठीक हो गए। अब लोगों को टीबी से बचाव के लिए जागरूक करते हैं। खुद का उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि दवा खाना न छोड़ना। वह बताते है कि टीबी ग्रसित मरीज के  परिवारीजनों को समझाना पड़ता है। क्योंकि ज्यादातर परिवार के ही लोग मरीज का साथ नहीं देते हैं। डर की वजह से उसे अलग कर देते हैं।


 
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कौसर - फोटो : अमर उजाला
एमडीआर के बाद भी बच गई जिंदगी
इलाहाबाद के मऊअइमा निवासी कौसर अब ड्राइवर हैं और लोगों को टीबी से बचने की सीख देते हैं। पहले वह सिलाई का काम करते थे। वर्ष 2012 में लगातार खांसी आने और बलगम में खून दिखने पर जांच कराई तो टीबी निकली। टीबी की बात सुनकर परिवार और पड़ोसी दूर रहने लगे। काम छूट गया। छह माह इलाज कराया और फिर मुंबई चले गए। वहां तीन चार माह रहे और पता चला कि दोबारा टीबी हो गई है। इस बार एमडीआर टीबी थी। हालत खराब होने पर घर लौट आए। आर्थिक तंगी थी। डाट्स से इलाज शुरू हुआ। करीब 18 माह दवाएं खाने के बाद सेहत में सुधार हुआ। अब खुद ड्राइवर हैं। लेकिन उनके इलाके में कोई भी टीबी का मरीज पता चलता है तो उसके घर पहुंच जाते हैं। परिजनों को सहयोग के लिए समझाते हैं। अपना कष्ट बताते हुए बीच में दवा न छोड़ने की सलाह देते हैं। वह टीबी सहायता केंद्र खोलने पर भी विचार कर रहे हैं।
 
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प्रतीकात्मक तस्वीर
फैक्ट फाइल
प्रदेश में करीब 479446  टीबी मरीज पंजीकृत हैं। इसमें 15 हजार मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) और 1600  एक्सडीआर के मरीज हैं। राजधानी में 12500 मरीज हैं, जिनमें एमडीआर के 550 और एक्सट्रीम ड्रग रेजिस्टेंस के 60 मरीज हैं। राज्य में अभी 2021 डीएमसीएस एवं 141 सीबीएनएएटी लैब हैं।

 
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