चारबाग रेलवे स्टेशन की बनावट दिल को छू लेने वाली है। आसमान से देखने पर यह शतरंज की बिसात सा नजर आता है, जहां मुहरें खड़ी दिखती हैं। यह तो हो गई चारबाग स्टेशन की बात। वहीं लोको वर्कशॉप है, जहां भाप के इंजनों की मरम्मत होती थी और कैरिज एंड वैगन वर्कशॉप में लकड़ी की बोगियों की मरम्मत की जाती थी। ऐसे ही रेलवे पुलों के लिए गर्डर बनाने के लिए ब्रिज वर्कशॉप तो डीजल इंजनों के लिए डीजल शेड। ये उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल की ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जो रेलवे की शान बढ़ाती हैं। ये खुद में स्वर्णिम इतिहास को समेटे हुए हैं। 16 अप्रैल 1853 को मुम्बई से थाणे के बीच पहली रेल चलाई गई थी, जिसे रेल सप्ताह के तौर पर मनाया जाता है।
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शतरंज की बिसात सा नजर आता है चारबाग रेलवे स्टेशन, यहां रात में आती थीं अंग्रेजी फौजें
Mon, 15 Apr 2019 05:03 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Mon, 15 Apr 2019 05:03 PM IST
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रेल सप्ताह
- फोटो : amar ujala
स्टीम इंजनों की होती थी मरम्मत
चारबाग रेलवे स्टेशन पर जब ट्रेनें चलनी शुरू हो गईं तो स्टीम इंजनों की मरम्मत के लिए वर्कशॉप की जरूरत महसूस हुई और अवध रुहेलखण्ड रेलवे कंपनी को लोको वर्कशॉप के लिए करीब डेढ़ लाख वर्ग फीट जमीन दी गई। जहां 1865 में वर्कशॉप बना दी गई। उस दौरान भाप इंजनों को आयात किया जाता था।
चारबाग रेलवे स्टेशन पर जब ट्रेनें चलनी शुरू हो गईं तो स्टीम इंजनों की मरम्मत के लिए वर्कशॉप की जरूरत महसूस हुई और अवध रुहेलखण्ड रेलवे कंपनी को लोको वर्कशॉप के लिए करीब डेढ़ लाख वर्ग फीट जमीन दी गई। जहां 1865 में वर्कशॉप बना दी गई। उस दौरान भाप इंजनों को आयात किया जाता था।
यार्ड में खड़ी पुरानी ट्रेन
- फोटो : amar ujala
इंग्लैंड से मरम्मत के लिए आती थीं लकड़ी की बोगियां
आलमबाग कैरिज एण्ड वैगन वर्कशॉप 152 साल पुरानी है। अंग्रेजी हुकूमत में यहां लकड़ी के डिब्बों की मरम्मत होती थी। लकड़ी की बोगियां इंग्लैण्ड से आती थीं। इसके बाद आजादी मिली तो वर्कशॉप उत्तर रेलवे को मिल गई, जिसके बाद यहां मालगाड़ी की बोगियों का मेंटेनेंस बंद कर दिया गया और सवारी डिब्बों की ओवरहॉलिंग होने लगी। ढाई लाख वर्ग फीट में फैली इस वर्कशॉप में अब एलएचबी बोगियों का भी रखरखाव हो रहा है। ओवरहॉलिंग भी हो रही है, जिसे रायबरेली रेल कोच फैक्ट्री जिम्मेदारी से करवा रही है।
आलमबाग कैरिज एण्ड वैगन वर्कशॉप 152 साल पुरानी है। अंग्रेजी हुकूमत में यहां लकड़ी के डिब्बों की मरम्मत होती थी। लकड़ी की बोगियां इंग्लैण्ड से आती थीं। इसके बाद आजादी मिली तो वर्कशॉप उत्तर रेलवे को मिल गई, जिसके बाद यहां मालगाड़ी की बोगियों का मेंटेनेंस बंद कर दिया गया और सवारी डिब्बों की ओवरहॉलिंग होने लगी। ढाई लाख वर्ग फीट में फैली इस वर्कशॉप में अब एलएचबी बोगियों का भी रखरखाव हो रहा है। ओवरहॉलिंग भी हो रही है, जिसे रायबरेली रेल कोच फैक्ट्री जिम्मेदारी से करवा रही है।
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रेल सप्ताह
- फोटो : amar ujala
डीजल इंजनों को मिली ताकत
डीजल इंजनों की मरम्मत के लिए 1988 में आलमबाग में डीजल शेड बनवाया गया, जिसका विस्तारीकरण जून 2016 में हुआ। 10.90 करोड़ रुपये से नया शेड बनवाया गया है, जिसमें 75 अश्वशक्ति लोकोमेटिव के मेंटेनेंस की क्षमता बढ़ गई है। शेड में 4,500 हॉर्सपावर के 64 इंजनों की मरम्मत होती थी, जिसमें मेल-एक्सप्रेस व मालगाड़ी के इंजन शामिल थे।
डीजल इंजनों की मरम्मत के लिए 1988 में आलमबाग में डीजल शेड बनवाया गया, जिसका विस्तारीकरण जून 2016 में हुआ। 10.90 करोड़ रुपये से नया शेड बनवाया गया है, जिसमें 75 अश्वशक्ति लोकोमेटिव के मेंटेनेंस की क्षमता बढ़ गई है। शेड में 4,500 हॉर्सपावर के 64 इंजनों की मरम्मत होती थी, जिसमें मेल-एक्सप्रेस व मालगाड़ी के इंजन शामिल थे।
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डेमो
- फोटो : amar ujala
अंग्रेजों ने अप्रैल 1867 में लखनऊ-कानपुर रेलखण्ड संचालन के लिए खोला था। चूंकि, उस समय छावनी में अंग्रेजी हुकूमत डेरा डाल चुकी थी। फौज के लिए रसद और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने के लिए चारबाग रेलवे स्टेशन बनवाया। जो कि वर्तमान में क्लॉक रूम तक सीमित था। उस वक्त यहां पर केवल सिंगल लाइन थी। यहां रात 11 बजे के बाद अंग्रेजी फौज आती थी। फिर 1926 में स्टेशन को मुकम्मल किया गया। जो कि अवधी व यूरोपीय वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। स्टेशन पर 1949 में एक 60 किलो का घंटा (अलार्म) लगवाया गया था। वहीं अब स्टेशन को 18 सौ करोड़ रुपये से अत्याधुनिक बनाने का खाका तैयार किया गया है।