एटीएस ने राजधानी की हाजी कॉलोनी में जिस कथित आतंकी मो. सैफुल्लाह को मुठभेड़ में मार गिराया, क्या उसे जिंदा पकड़ना नामुमकिन था? यूं तो इस सवाल का जवाब आसान नहीं, पर कुछ पुलिस अफसरों का भी मानना है कि जल्दबाजी में हमनें एक अहम सुबूत खो दिया। मौके पर दिखाई गई 12 घंटे की मुठभेड़ के शुरुआती 4-6 घंटे के भीतर ही सैफुल्लाह को ढेर कर दिया गया था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा कर रही है। दरअसल, जब तक सैफुल्लाह को जिंदा पकड़ने की ‘लाइन’ मौके पर कार्रवाई कर रहे एटीएस के जवानों तक पहुंची, तब तक सैफुल्लाह का वजूद हमेशा-हमेशा के लिए मिट चुका था।
क्या जिंदा नहीं पकड़ा जा सकता था सैफुल्लाह, अब उठ रहे हैं गंभीर सवाल
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पुख्ता इनपुट के आधार पर एटीएस ने मंगलवार की दोपहर करीब 2:15 बजे काकोरी थाना क्षेत्र स्थित हाजी कॉलोनी में उस घर को घेर लिया, जहां संदिग्ध आतंकियों के ठहरने की जानकारी मिली थी। एटीएस के सिपाहियों ने जैसे ही दरवाजे पर दस्तक दी, अंदर से 9 एमएम की पिस्टल से फायरिंग शुरू हो गई। एटीएस के जवाबी फायरिंग करने पर सैफुल्लाह ने खुद को कमरे में बंद कर लिया। पुलिस का दावा है कि देर रात तक दोनों ओर से फायरिंग होती रही और रात 2:40 बजे उसने सैफुल्लाह को मार गिराया। पुलिस का कहना है कि उसके ही कुछ साथियों ने मध्य प्रदेश में भोपाल-उज्जैन पैसेंजर में ब्लास्ट किया था। अब वे लखनऊ का इमामबाड़ा समेत कई दरगाहों को अपना निशाना बनाना चाहते थे। उन्हें आईएसआईएस का कानपुर-लखनऊ खुरासान माड्यूल भी बताया गया।
इसमें शायद ही किसी को शक हो कि अगर सैफुल्लाह जिंदा पकड़ा जाता तो उससे आतंकियों का नेटवर्क समझने और खत्म करने के लिए ज्यादा जानकारियां मिल सकती थीं। एटीएस की कार्रवाई पर पहला सवाल तो यह उठ रहा है कि जिस मिर्ची बम ने आसपास रहने वालों तक को डॉक्टरों के पास पहुंचा दिया, उस मिर्ची बम को लक्ष्य करके एक मकान में दागा गया और सैफुल्लाह पर उसका कोई असर नहीं हुआ। यहां तक कि उस पर आंसू गैस भी बेअसर रही। आईजी, एटीएस असीम अरुण कहते हैं कि यह हमारे लिए भी शोध का विषय है। हो सकता है सैफुल्लाह के पास कोई ऐसा केमिकल हो, जिससे मिर्ची बम या टियर गैस ने असर न किया हो। क्या ऐसा कोई केमिकल या उससे संबंधित सुबूत मौके से बरामद हुआ? तो उनका जवाब ‘न’ में था।
पुलिस का ही कहना है सैफुल्लाह के पास कोई दूर तक मारने की क्षमता वाला हथियार नहीं था। ऐसे में तड़ातड़ उसके शरीर में 12 गोलियां दागने की बात भी विशेषज्ञों के गले नहीं उतर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि सैफुल्लाह को एक-दो गोलियों से घायल करके और फिर थोड़ा इंतजार करके काबू में किया जा सकता था। सूत्रों की मानें तो जिसे मंगलवार/बुधवार की रात 2:40 बजे मारने का दावा किया जा रहा है, उसे मंगलवार की रात 9 बजे से पहले ही मार दिया गया था। बुधवार को दिन में 2:45 बजे शुरू हुए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से भी इसकी पुष्टि हो रही है। इसमें मौत का समय ‘एक दिन पूर्व’ यानी 18-24 घंटे पहले बताया गया है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि पुलिस के वरिष्ठतम अधिकारी ऑपरेशन के दौरान अंत तक मौके पर नहीं पहुंचे। पुलिस और एटीएस के बीच पैदा हुई संवादहीनता का ही नतीजा है कि एक ‘सुबूत’ अहम जानकारियां देने से पहले ही मिट गया।
पड़ोसी अब्दुल कय्यूम से मिलने नहीं दे रही पुलिस
पुलिस और एटीएस ने सैफुल्लाह से मकान किराया वसूलने वाले पड़ोसी अब्दुल कय्यूम से किसी को नहीं मिलने दिया। हालांकि, एडीजी दलजीत चौधरी ने इस संवाददाता से कहा, आप (संवाददाता) जाकर मिलिए। आपको मिलने से किसने रोका है। कुछ ही देर बाद इस संवाददाता ने अब्दुल कय्यूम से मिलने के लिए फोन पर संपर्क किया, तब वह एटीएस की गिरफ्त में पहुंच चुका था। कय्यूम ने बाद में बात करने की बात कही।