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आपातकाल के 45 साल: यातनाएं झेलने वालों ने सुनाई आपबीती, बोले- बिखर गए सपने, अधूरे रह गए संकल्प

Thu, 25 Jun 2020 04:21 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 25 Jun 2020 04:21 PM IST
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आपातकाल के दौरान जेलों में रहने वाले लोकतंत्र सेनानी। - फोटो : amar ujala

25 जून 1975 जब देश में आपातकाल लगाया गया था। तबसे 45 साल गुजर गए। इस दौरान कई सरकारें बदलीं, नेतृत्व बदला और सत्ता के चेहरे भी बदल गए। उस समय संघर्ष में शामिल कई प्रमुख लोग अब दुनिया में नहीं हैं। वहीं, जो उस समय किशोरावस्था में थे, वे अब प्रौढ़ हो चुके हैं। इनमें तमाम ऐसे चेहरे शामिल हैं जिन्हें आपातकाल के दौरान उत्पीड़न व अत्याचार ही नहीं, कारागार की कठोर यातनाएं भी झेलनी पड़ीं।



मगर इन लोकतंत्र सेनानियों को भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा के उन सवालों को लेकर आज भी पीड़ा हो रही है, जिनको लेकर चले आंदोलन से घबराकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया था। ये लोकतंत्र सेनानी कहते हैं कि उस आंदोलन में उभरे सवाल आज भी जहां के तहां बरकरार हैं।

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शैलेंद्र दुबे। - फोटो : amar ujala

आंदोलन से निकले चेहरे ही फंस गए भ्रष्टाचार में
बात 1973 की है। शैलेंद्र दुबे उस समय गुजरात विश्वविद्यालय में एमटेक की पढ़ाई कर रहे थे। वह बताते हैं,  चिमन भाई पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मूंगफली तेल के सिंडीकेट ने अचानक तेल की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी। हमारे छात्रावास के मेस की फीस 65 रुपये से बढ़ाकर 110 रुपये कर दी गई।

पता चला कि चिमन भाई ने उस तेल सिंडीकेट से चंदा लिया था जिस कारण उसने मनमाने तरीके से कीमतें बढ़ा दीं। नतीजतन, हर विचारधारा के छात्रों ने मिलकर गुजरात नवनिर्माण समिति का गठन कर भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। जयप्रकाश नारायण व आचार्य जेबी कृपलानी ने भी छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार तक पहुंच गया।

सोशलिस्ट पार्टी के नेता राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय से रायबरेली संसदीय सीट का चुनाव रद्द होने पर इंदिरा गांधी ने लोगों की आवाज दबाने के लिए आपातकाल लगा दिया। लोग जेलों में बंद कर दिए गए। पर, आज लगता है कि उस आंदोलन का नतीजा क्या निकला। आपातकाल के खिलाफ आंदोलन से निकले लालू यादव जैसे चेहरे खुद भी भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे दिखे।

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राजेंद्र तिवारी। - फोटो : amar ujala

बिखरती चली गईं उम्मीदें, सत्ता हासिल करने के स्वार्थ की सहायक बन गई लड़ाई
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े राजेंद्र तिवारी कोलकाता से लखनऊ आकर गुजरात से उठी चिंगारी का हिस्सा बने। तिवारी बताते हैं, 30  जून 1975 को मैं नानाजी देशमुख का एक गोपनीय पत्र प्रो. राजेंद्र सिंह रज्जू भैया को पहुंचाने जा रहा था। कैसरबाग चौराहे पर कोतवाल शंकर सिंह ने पकड़ लिया।

लगभग 21 महीने की प्रताड़ना के बाद जेल से छूटा, लेकिन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी व महंगाई के खिलाफ लड़ने का जोश तब क्षोभ में बदलने लगा जब गैर कांग्रेसी सरकारों ने भी इन सवालों पर समझौता करना शुरू कर दिया। व्यवस्था परिवर्तन की वह लड़ाई कुछ लोगों के सत्ता हासिल करने के स्वार्थ की सहायक बनने से ज्यादा कुछ हासिल न कर पाई।

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डॉ. दाऊजी गुप्त। - फोटो : amar ujala

जेपी के शिष्यों ने ही किया निराश
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मित्र तथा लखनऊ के तीन बार महापौर रहे डॉ. दाऊजी गुप्त बताते हैं, एक अक्तूबर 1975 को बच्चों को स्कूल छोड़ने जा रहा था। नाका थाने पर गिरफ्तारी हो गई। उसी जीप में जनसंघ की पूर्व सांसद शकुंतला नैयर, चंद्रशेखर के साथी, एमएलसी जगन्नाथ शास्त्री सहित पांच लोगों को बैठाकर जेल भेज दिया गया।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आपातकाल के बाद देश में सत्ता के लिए दलबदल का ऐसा खेल शुरू हुआ जिसने सभी राजनीतिक दलों को सिद्धांतों से समझौता करना ही नहीं सिखाया बल्कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसे सवालों को भी पीछे कर दिया। जयप्रकाश नारायण के ही कई शिष्य भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने दिखे तो उम्मीदें पूरी तरह टूट गईं।

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हृदय नारायण दीक्षित - फोटो : amar ujala

...डेढ़ घंटे में ही अबे से मान्यवर हो गया
विधानसभा अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित लोकतंत्र सेनानी भी हैं। आपातकाल के दौरान लगातार जेल में रहे और यातनाएं भुगतने वाले दीक्षित बताते हैं कि इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की प्रेरणा 1933 में हिटलर द्वारा जर्मनी में लगाई गई इमरजेंसी से मिली थी। आपातकाल के समय वैचारिक स्वतंत्रता का गला घोंट दिया गया था।

बकौल दीक्षित, आपातकाल में उन्नाव जेल में बंद थे। लोकसभा के चुनाव हुए। हमारे पास एक छोटा ट्रांजिस्टर था। उस दिन चुनाव नतीजे आ रहे थे।  मैं ट्रांजिस्टर पर रिजल्ट सुन रहा था। रात लगभग 3 बजे जेलर आया। उसने बहुत डांटा, अपशब्द कहे। पर, सुबह 5.30 बजते-बजते जनता पार्टी की सरकार बनना तय हो गया था। इंदिरा गांधी इस्तीफा दे चुकी थीं।

सुबह 6.30 बजे वही जेलर फिर आया। इस बार उसके स्वर मीठे हो चुके थे। कहा मान्यवर! आप सबको बधाई हो। आपकी सरकार बनने जा रही है। मैं सोच रहा था कि वाह जनता की ताकत। जिसने 1.30 घंटे के भीतर ही हमें अबे से मान्यवर बना दिया।

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