गुलिस्ताने इरम, दर्शन विलास और कोठी रोशनुद्दौला। लखनऊ के कैसरबाग में बनी ये उन कोठियों के नाम हैं, जो वर्षों से जर्जर व मरम्मत केइंतजार में खड़ी थीं। पर, अब इनकी रंगत बदल गई है। कोठियों की चमक लौट आई है और अब इनकी खूबसूरती देखने लायक है। इन कोठियों को अब पर्यटकों का इंतजार है, ताकि ये गुलजार हो सकें। दरअसल, संस्कृति विभाग की ओर से राजधानी पुरानी कोठियों की मरम्मत का खाका तैयार करवाया गया, जिस पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए और उनकी रंगत को वापस लौटाया गया। छतर मंजिल के सामने स्थित गुलिस्ताने इरम व दर्शन विलास और कैसरबाग बस अड्डे के सामने बनी रोशनुद्दौला कोठी में इतिहास आज भी जवां है।
करोड़ों रुपये खर्च कर इन कोठियों की हुई मरम्मत, ... अब पर्यटकों का इंतजार
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इतिहासकार योगेश प्रवीण बताते हैं कि गुलिस्ताने इरम का निर्माण बादशाह नसीरुद्दीन हैदर केकार्यकाल में हुआ था। यह प्रमुख रूप स्टडी के लिए बनवाई गई लाइब्रेरी थी, जिसमें दुनियाभर की अलग-अलग भाषाओं की सैकड़ों किताबें थीं।इतना ही नहीं, इसमें आराम के लिए विशेष प्रबंध थे। इसका बेसमेंट खासा बड़ा है।पुराने रंगरूप में लाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी। सकरे रास्तों से लोहे की बीमों को ले जाना चुनौती भरा काम था। गुलिस्ताने इरम में ही गाजीउद्दीन हैदर के बेटे नसीद्दीन हैदर को सेविका धनिया मेहरी के हाथों जहर दिलवाया गया। बाद में धनिया मेहरी को कत्ल कर दिया गया था। वहीं लाल बरादरी का निर्माण 1778-1814 के बीच हुआ था। सआदत अली खां से लेकर वाजिद अली शाह तक का ‘दरबार ए हाल’ लगाया जाता था। यहां अवध के कई नवाबों की ताजपोशी भी हुई है। जबकि इसके पीछे बनी है कोठी दर्शन विलास। जिसका निर्माण बादशाह नसीरुद्दीन हैदर ने कुदर्शिया महल के लिए बनवाया था। यह इंडो फ्रेंच स्टाइल की बिल्डिंग है। इतिहासकार योगेश प्रवीण बताते हैं कि इसकी खूबसूरती को देखने के लिए सूर्यास्त केसमय हजरतगंज से पर्यटक तारे वाली कोठी (वर्तमान में एसबीआई ऑफिस) के पास आते थे।
नवाब नसीरुद्दीन हैदर के वजीर रोशनुद्दौला ने इस कोठी का निर्माण करवाया था। 1960 में जब बाढ़ आई तो सुरंगों में गोमती का पानी ऊपर तक भर गया। कोठी रोशनुद्दौला में पानी इतना भर गया कि इमारत दरकने लगी और ऊपर की तीन मंजिलों को गिराना पड़ा। अंग्रेजी हुकूमत में काकोरी कांड की सुनवाई यहीं पर हुई थी। अवाम का बढ़ता विरोध देख कोर्ट को रिंक थिएटर (वर्तमान में जीपीओ) में शिफ्ट कर दिया गया था। कोठी रोशनुद्दौला की रंगत निखर आई है और पर्यटकों के आने से इसकी शान भी बढ़ जाएगी। अवध के मंत्री मोहम्मद हुसैन खां ने इसे बनवाया था, जहां खजाना रखा जाता था।
ऐसे पहुंचें इन कोठियों तक
कोठी रोशनुद्दौला, दर्शन विलास व गुलिस्ताने इरम तक पर्यटकों को लाने के लिए कैसरबाग हेरिटेज वॉक बनाया गया है, जिसमें लोगों को इन कोठियों के इतिहास से रूबरू कराने की योजना है। इसके अतिरिक्त यहां पहुंचने के लिए चारबाग से यात्री परिवर्तन स्थल पहुंच सकता है, जहां से दो सौ मीटर पैदल यात्रा कर दर्शन विलास व गुलिस्ताने इरम और वहीं से कैसरबाग बस अड्डे केपास बनी रोशनुद्दौला कोठी तक रिक्शे से भी जा सकता है। इतना ही नहीं चारबाग सेे सीधे कैसरबाग आकर भी पर्यटक कोठियां घूम सकता है।
‘तीनों कोठियां तैयार हो चुकी हैं और पर्यटकों को यहां तक लाने के लिए योजनाओं पर काम चल रहा है। फिलहाल कैसरबाग हेरिटेज वॉक केअंतर्गत इन कोठियों केइतिहास से रूबरू हुआ जा सकता है।’ - अनुपम श्रीवास्तव, क्षेत्रीय पर्यटक अधिकारी