एक साल की उम्र तक बच्चा न सुने तो हो जाएं सतर्क, तत्काल डॉक्टर को दिखाएं
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पीजीआई के न्यूरो ऑटोलॉजी यूनिट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमित केसरी ने बताया कि प्री मेच्योर प्रेग्नेंसी वाले बच्चों, एनआईसीयू में रहने वाले बच्चों या जो गर्भवती अधिक दवाओं का सेवन करती हैं, उनके बच्चों में कान से जुड़ी बीमारियां ज्यादा पाई गई हैं। ऐसे लोगों को सावधानी बरतने की जरूरत होती है। लोग इस उम्मीद में समय गंवा देते हैं कि उम्र बढ़ने पर बच्चा सुनने और बोलने लगेगा। बाद में ऐसे बच्चों का इलाज मुश्किल हो जाता है। इसी तरह स्ट्रोक और वायरल इंफेक्शन से ग्रसित लोगों में भी सुनाई पड़ना बंद हो जाता है। इसी तरह कुछ बच्चोें में अनुवांशिक समस्या भी होती है। ये बच्चे समय से आ जाएं तो उनका इलाज आसान रहता है, क्योंकि उम्र बढ़ने पर ब्रेन विकसित होता है और आवाज की वजह से सिग्नल देने वाले सर्किट सुषुप्तावस्था में चले जाते हैं।
कॉक्लियर इम्प्लांट के तहत बच्चों के कान के आंतरिक हिस्से में सर्जरी करके एक मशीन लगाई जाती है। इस इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के जरिये बच्चा पहले सुनने और फिर बोलने लगता है। यह डिवाइस माइक्रोफोन, स्पीच प्रोसेसर, ट्रांसमीटर, रिसीवर और इलेक्ट्रोड से बनाया जाता है। माइक्रोफोन आवाज को प्रोसेसर तक पहुंचाता है। यहां से आवाज फिल्टर होकर इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल के जरिये ट्रांसमीटर तक पहुंचती है।
जिन बच्चों को सुनाई नहीं पड़ता है, उनके सीटी स्कैन, एमआरआई से इस बात की जानकारी की जाती है कि आंतरिक हिस्से में कान का हिस्सा है या नहीं। कॉक्लियर का हिस्सा ठीक नहीं होता है तो ब्रेन की हड्डी में जगह बनाकर डिवाइस लगाई जाती है। इससे बच्चा सुनने लगता है। जब उसकी सुनने की क्षमता विकसित हो जाती है तो वह बोलने भी लगता है। एसजीपीजीआई में पिछले साल राज्य सरकार की मदद से 10 बच्चों में मुफ्त कॉक्लियर इम्प्लांट लगा था। इस साल अभी तक तीन में मुफ्त इम्प्लांट लग चुका है। करीब सात बच्चों में लगाने की तैयारी चल रही है।
प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री राहत कोष से भी यह इम्प्लांट लगवाया जा सकता है। इसकी कीमत करीब छह लाख रुपये आती है। अब तक कुल करीब सौ बच्चों में कॉक्लियर इम्प्लांट किया जा चुका है। आमतौर पर एक से तीन साल की उम्र वाले बच्चों में इसे लगाने के बाद बेहतरीन परिणाम दिखे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, अभी एक हजार बच्चों में से छह बच्चे को सुनने की समस्या होती है। इसमें तीन या चार बच्चे इलाज से ठीक हो जाते हैं। वहीं एक हजार बच्चों में से एक बच्चे को ही कॉक्लियर इम्प्लांट की जरूरत होती है।