मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की धरती पर इस्लामिक परंपरा के पैगंबरों व फकीरों ने पूरी शिद्दत से धूनी रमाई। अति प्राचीन दरगाह सैयद इब्राहिम शाह मजूब उन्हीं में से एक थे। इनकी गणना शेख मोइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया, किछौछा में आराम फरमा रहे हजरत जहांगीर समनानी जैसे शीर्षस्थ सूफी संतों में होती है।
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सद्भाव की अयोध्याः हिंदू -मुस्लिम पहले इस मजार पर रखते हैं चाबी फिर खोलते हैं दुकान
Thu, 24 Oct 2019 04:31 PM IST
Amulya Rastogi
धीरेंद्र सिंह/अमर उजाला, अयोध्या
धीरेंद्र सिंह/अमर उजाला, अयोध्या
Published by: Amulya Rastogi
Updated Thu, 24 Oct 2019 04:31 PM IST
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हजरत शाह इब्राहिम की मजार
- फोटो : amar ujala
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हजरत शाह इब्राहिम की मजार
- फोटो : amar ujala
मान्यता है कि हजरत की दर से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। यहां रोज तमाम हिंदू-मुस्लिम दुकानदार मजार पर चाबी रखकर सजदा करके ही दुकान का ताला खोलते हैं। अब सब लोगों की एक ही दुआ है कि जल्द अयोध्या विवाद निपटे ताकि जायरीनों का देश-विदेश से आना-जाना बढ़े और शहर की तरक्की हो। अयोध्या की साझी संस्कृति की पहचान राम की पैड़ी से सटे स्वर्गद्वार के अड़गड़ा चौराहे पर हजरत इब्राहिम शाह की मजार है।
मो जुनैद कादरी
- फोटो : amar ujala
गद्दीनशीन मो. जुनैद कादरी बताते हैं कि हजरत साढ़े तीन सौ साल पहले ताशकंद के बुखारा से आए थे। वे वहां के शहंशाह के शाहजादे थे, पर किशोरावस्था से ही राजकीय वैभव-विलास को तिलांजलि दे लंबी यात्रा करते हुए अयोध्या आ पहुंचे। कहते हैं कि पड़ोसी जिले अंबेडकरनगर में सूफी मकदूम असरफ किछौछा का जन्म हजरत इब्राहिम शाह मजूब के आशीर्वाद से हुआ था। यहां रोजाना सैकड़ों हिंदू-मुस्मिल परिवार मन्नते मांगने आते हैं। बृहस्पतिवार को ज्यादा भीड़ होती है। वे तमाम हिंदू-मुसलमान दुकानदारों के नाम गिनाते हैं, जो दुकान खोलने से पहले मजार पर चाबी रखना शुभ समझते हैं। कहते हैं कि ऐसा करने बरकत आती है, कारोबार बढ़ता है। सब यही दुआ मांगते हैं कि अयोध्या विवाद का फैसला जल्द आ जाए, बाहर के लोगों में भय-संकोच दूर हो, ताकि कारोबार बढ़े।
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मो. मज्जब अली
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मौलवी मज्जब अली यहां कई जिलों के बच्चों को शिक्षा देते हैं, कहते हैं कि एक बार बाबा की मजार के गुंबद का सोना चढ़ा हुआ कलश चोरी करने तीन चोर चढ़े, दो वहीं अंधे हो गये जबकि जिसने कलश को हाथ लगाया वह चिपक गया। बहुत मन्नतों के बाद वह दूसरे दिन छूट पाया, मगर अंधा हो गया। अब बाबा से एक ही दुआ है कि अयोध्या विवाद में फैसला आ जाए, ताकि देश-विदेश से जायरीनों के आने का सिलसिला बढ़े। वेो कहते हैं कि सबसे ज्यादा जायरीन पुत्र रत्न के लिए यहां शीश झुकाने आते हैं और मन्नत पूरी होने पर प्रसाद चढ़ाते हैं।
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गुंबद
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इंडियन मुस्लिम लीग के प्रांतीय अध्यक्ष और सूफी संतों के मुरीद डॉ. नजमुल हसन गनी के अनुसार हजरत का अयोध्या आना महज संयोग नहीं था। अयोध्या की जमीन बहुत हसीन और पाक है, यहां कदम नहीं पलक के बल चलना चाहिए और इस रूहानी सच्चाई से प्रेरित हो हजरत इब्राहिम ने धूनी रमाई होगी। इनकी गणना शेख मोइनुद्दीन चिश्ती, निजामुद्दीन औलिया, किछौछा में आराम फरमा हजरत जहांगीर समनानी जैसे शीर्षस्थ सूफी संतों में होती रही है। इब्राहिम शाह के आस्ताने में हिन्दू व मुस्लिम समुदाय के जरूरत मंद लोग एक साथ आकर सजदा करते है। कहा जाता है कि बहुत भाग्यशाली लोगों को ही यहां आने का अवसर मिल पाता है। शारीरिक बीमारियों से भी मुक्ति मिल जाती है।