पश्चिमी यूपी में किसानों के आंदोलन के संभावित असर ने भाजपा के रणनीतिकारों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर पंचायत चुनाव को लेकर भाजपा नेतृत्व चौकन्ना हो गया है। पार्टी के रणनीतिकार इस हवा के और तेज होने से पहले ही इसकी रफ्तार को रोकने या मोड़ने की कोशिश में जुट गए हैं।
पश्चिम की हवा ने पूर्वी यूपी में बढ़ाई भाजपा की चिंता, डैमेज को कंट्रोल करने में जुटे पार्टी के रणनीतिकार
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दरअसल पूर्वी यूपी का किसान पश्चिमी यूपी के किसानों की तरह आर्थिक रूप से समृद्ध और खेती-किसानी को लेकर बहुत जागरूक नहीं हैं। इसके बावजूद इस इलाके के किसानों में राजनीतिक चेतना, जागरूकता व मुखर संघर्ष की क्षमता कम नहीं है। अतीत के कई आंदोलन इसके उदाहरण हैं।
हालांकि यह भी सही है कि दिल्ली की सीमा पर चल रहा आंदोलन अब पहले जितना न धारदार और असरदार नहीं रही। पर, पिछले दिनों किसान नेता नरेश टिकैत ने पूर्वी यूपी के कुछ जिलों के दौरे में जिस तरह से किसानों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की अपील की थी, उससे भाजपा सतर्क हो गई है।
पंचायत चुनाव से जुड़े भाजपा के एक नेता कहते भी हैं कि तीनों कृषि कानूनों को लेकर जिस तरह किसानों को भ्रमित किया जा रहा है उसका पंचायत व विस चुनाव में असर पड़ सकता है। यही नहीं पिछले दिनों खाद के दामों में हुई बढ़ोतरी ने भी पंचायत चुनाव में भाजपा के लिए चुनौती बढ़ा दी है। गौरतलब है कि भाजपा ने इस बार जिला पंचायत के चुनाव में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों को उतारने का फैसला किया है।
अनुप्रिया व ओमप्रकाश भी चुनौती
पूर्वी यूपी को लेकर भाजपा इसलिए भी ज्यादा चिंतित है, क्योंकि ओमप्रकाश राजभर और अनुप्रिया पटेल जैसे नेता इसी इलाके में सक्रिय हैं। ओमप्रकाश अब भाजपा के साथ नहीं है। अनुप्रिया भाजपा के साथ तो हैं, लेकिन पंचायत चुनाव में अकेले लड़ने की उनकी घोषणा ने दोनों पार्टियों के बीच एक लकीर खींच दी है।
सियासी कारणों से दोनों दलों के रिश्ते भी पहले जैसे सहज नहीं दिखते। ऐसे में भाजपा की कोशिश है कि किसानों को लेकर पश्चिमी यूपी की हवा को पूर्वी यूपी में बहुत ज्यादा न फैलने दी जाए।