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मंगेतर के रूठने पर बहन ने दी सलाह, तो उन्हें मनाने टेडी लेकर पहुंच गया दिल्ली
Mon, 11 Feb 2019 04:50 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Mon, 11 Feb 2019 04:50 PM IST
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टेडी डे
- फोटो : amar ujala
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चॉकलेट डे पर लोगों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा कराकर रिश्तों में मिठास तो घोल दी, पर अपने दिल की बात नहीं कह पाएं हैं तो आपका काम टेडी कर सकता है। लखनऊ के लोग खुद बता रहे हैं टेडी से जुड़ीं अपनी यादें...।
टेडी डे
- फोटो : amar ujala
आधी रात को हॉस्टल में पहुंचा उनका टेडी
दिव्या के साथ मेरा रिश्ता तय था। हमारी रिलेशनशिप शुरू हुए एक साल पूरा हो गया था। एक साल पहले इसी दिन हमने दिव्या को प्रपोज किया था। रात के 12 बजे होंगे। तभी मेरे नाम का एक गिफ्ट मेरे कमरे तक आया। दोस्त भी कमरे में मौजूद थे। सबकी निगाहें उसी पर थीं, गिफ्ट खोला तो उसमें एक प्यारा सा टेडी निकला। उसने हार्ट शेप को हाथ में थामे हुआ था। उस पर लिखा था आई लव यू। वह पल मेरे लिए आज भी स्पेशल है। मैंने तुरंत दिव्या को फोन किया और बदले में अपनी भावनाएं जताते हुए उन्हें शुक्रिया कहा।
- पत्नी दिव्या के साथ कुशल।
दिव्या के साथ मेरा रिश्ता तय था। हमारी रिलेशनशिप शुरू हुए एक साल पूरा हो गया था। एक साल पहले इसी दिन हमने दिव्या को प्रपोज किया था। रात के 12 बजे होंगे। तभी मेरे नाम का एक गिफ्ट मेरे कमरे तक आया। दोस्त भी कमरे में मौजूद थे। सबकी निगाहें उसी पर थीं, गिफ्ट खोला तो उसमें एक प्यारा सा टेडी निकला। उसने हार्ट शेप को हाथ में थामे हुआ था। उस पर लिखा था आई लव यू। वह पल मेरे लिए आज भी स्पेशल है। मैंने तुरंत दिव्या को फोन किया और बदले में अपनी भावनाएं जताते हुए उन्हें शुक्रिया कहा।
- पत्नी दिव्या के साथ कुशल।
टेडी डे
- फोटो : amar ujala
उन्हें मनाने टेडी लेकर दिल्ली पहुंच गया
मैंने टेडी न तो किसी को कभी दिया था और ना ही मुझे किसी ने गिफ्ट किया था, लेकिन अब टेडी हमारी जिंदगी का एक यादगार पल है। बात उस वक्त की है जब मुरादाबाद में मेरी ट्रेनिंग चल रही थी। रतन ज्योति मेरी मंगेतर थीं। किसी बात पर वह नाराज हो गईं। हमारी बातचीत भी बंद हो गई। मैं परेशान होकर बनारस में अपनी बहन गरिमा के पास पहुंचा। उसने समझाया और मंगेतर को टेडी गिफ्ट करने की सलाह दी। मैंने एक प्यारा सा टेडी जिंदगी में पहली बार खरीदा और उसे लेकर सीधे दिल्ली मंगेतर से मिलने चला गया। न कोई सफाई, न ही कोई गिला शिकवा। उन्होंने मुस्कुराते हुए टेडी ले लिया। आज तक हम उसे टेडी को याद करते हैं। अब तो टेडी हमारे बच्चों का भी सबसे प्यारा खिलौना है।
- पत्नी रतन ज्योति व बच्चों के साथ पारितोष गुप्ता, स्पेशल इंटेलीजेंस ऑफिसर
मैंने टेडी न तो किसी को कभी दिया था और ना ही मुझे किसी ने गिफ्ट किया था, लेकिन अब टेडी हमारी जिंदगी का एक यादगार पल है। बात उस वक्त की है जब मुरादाबाद में मेरी ट्रेनिंग चल रही थी। रतन ज्योति मेरी मंगेतर थीं। किसी बात पर वह नाराज हो गईं। हमारी बातचीत भी बंद हो गई। मैं परेशान होकर बनारस में अपनी बहन गरिमा के पास पहुंचा। उसने समझाया और मंगेतर को टेडी गिफ्ट करने की सलाह दी। मैंने एक प्यारा सा टेडी जिंदगी में पहली बार खरीदा और उसे लेकर सीधे दिल्ली मंगेतर से मिलने चला गया। न कोई सफाई, न ही कोई गिला शिकवा। उन्होंने मुस्कुराते हुए टेडी ले लिया। आज तक हम उसे टेडी को याद करते हैं। अब तो टेडी हमारे बच्चों का भी सबसे प्यारा खिलौना है।
- पत्नी रतन ज्योति व बच्चों के साथ पारितोष गुप्ता, स्पेशल इंटेलीजेंस ऑफिसर
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टेडी डे
- फोटो : amar ujala
पत्नी ने अब तक संभाल कर रखा है टेडी
हमारा रिश्ता तय हो गया था। हमारी बातें होती थीं। किसी बात पर ज्योति नाराज हो गईं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उनकी नाराजगी कैसे दूर करूं। फिर मैंने अचानक एक टेडी खरीदा। उस टेडी के साथ एक कागज पर ‘आई एम सॉरी’ लिखकर भेज दिया। माफी मिलने की बता छोड़िए बदले में इतना प्यार मिला कि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस टेडी में ऐसा क्या है। बाद में पता चला कि वह नाराज इसलिए थीं क्योंकि मैं उन पर ध्यान नहीं दे रहा था।
- पत्नी ज्योति के साथ देवब्रत, प्रोग्रामर, एकेटीयू
हमारा रिश्ता तय हो गया था। हमारी बातें होती थीं। किसी बात पर ज्योति नाराज हो गईं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उनकी नाराजगी कैसे दूर करूं। फिर मैंने अचानक एक टेडी खरीदा। उस टेडी के साथ एक कागज पर ‘आई एम सॉरी’ लिखकर भेज दिया। माफी मिलने की बता छोड़िए बदले में इतना प्यार मिला कि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस टेडी में ऐसा क्या है। बाद में पता चला कि वह नाराज इसलिए थीं क्योंकि मैं उन पर ध्यान नहीं दे रहा था।
- पत्नी ज्योति के साथ देवब्रत, प्रोग्रामर, एकेटीयू
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टेडी डे
- फोटो : amar ujala
कुछ अलग
हमारे यहां तो तीन पीढ़ियों से चल रहा प्रेम विवाह
एमबीबीएस के दौरान साथी डॉ. गीता का 14 फरवरी को जन्मदिन था। उस दिन हमने उन्हें परिसर से ही गुलाब का फूल भेंट किया। इसके बाद यह फूल पूरे परिवार का गुलदस्ता बन गया। 1982 में गीता के साथ मेरी शादी हो गई। हमारा परिवार एक पीढ़ी पहले से ही लव मैरिज की वकालत करता रहा है।
मेरे पिता डॉ. अवतार कृष्ण वाखलू केजीएमयू में पीडियाट्रिक के विभागाध्यक्ष रहे। यहीं मां डॉ. इंदु वाखलू भी रहीं। कहीं कोई विरोध नहीं रहा। उन्होंने 1962 सात फेरे लिए। यही वजह है कि बिना किसी झिझक के मेरी और डॉ. गीता की दोस्ती धीरे-धीरे मुहब्बत बन गई। इसके बाद डॉ. गीता पूरे परिवार से मिलती-जुलती रहीं। एक दिन हमने मां से बात की। मां ने पिताजी को बताया तो वह चौंक गए। वह भी गीता को बहू के रूप में देखना चाहते थे। फिर क्या था। दोनों की शादी हुई। इसके बाद भाई प्रो. अनुपम और डॉ. अर्चना ने भी 1985 में लव मैरिज की। इसी क्रम में हमारी बेटी अवंती और दामाद अभिनव भी बचपन से एक-दूसरे को जानते थे और साथ-साथ पढ़ाई की। इन दोनों की भी लव मैरिज ही रही। लव मैरिज में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। बल्कि इसे बढ़ावा देने की जरूरत है। इससे कई सामाजिक संकट खत्म हो जाएंगे।
- प्रो. आशीष वाखलू, पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग, केजीएमयू
हमारे यहां तो तीन पीढ़ियों से चल रहा प्रेम विवाह
एमबीबीएस के दौरान साथी डॉ. गीता का 14 फरवरी को जन्मदिन था। उस दिन हमने उन्हें परिसर से ही गुलाब का फूल भेंट किया। इसके बाद यह फूल पूरे परिवार का गुलदस्ता बन गया। 1982 में गीता के साथ मेरी शादी हो गई। हमारा परिवार एक पीढ़ी पहले से ही लव मैरिज की वकालत करता रहा है।
मेरे पिता डॉ. अवतार कृष्ण वाखलू केजीएमयू में पीडियाट्रिक के विभागाध्यक्ष रहे। यहीं मां डॉ. इंदु वाखलू भी रहीं। कहीं कोई विरोध नहीं रहा। उन्होंने 1962 सात फेरे लिए। यही वजह है कि बिना किसी झिझक के मेरी और डॉ. गीता की दोस्ती धीरे-धीरे मुहब्बत बन गई। इसके बाद डॉ. गीता पूरे परिवार से मिलती-जुलती रहीं। एक दिन हमने मां से बात की। मां ने पिताजी को बताया तो वह चौंक गए। वह भी गीता को बहू के रूप में देखना चाहते थे। फिर क्या था। दोनों की शादी हुई। इसके बाद भाई प्रो. अनुपम और डॉ. अर्चना ने भी 1985 में लव मैरिज की। इसी क्रम में हमारी बेटी अवंती और दामाद अभिनव भी बचपन से एक-दूसरे को जानते थे और साथ-साथ पढ़ाई की। इन दोनों की भी लव मैरिज ही रही। लव मैरिज में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। बल्कि इसे बढ़ावा देने की जरूरत है। इससे कई सामाजिक संकट खत्म हो जाएंगे।
- प्रो. आशीष वाखलू, पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग, केजीएमयू