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गोल्ड मेडलिस्ट बोलीं, अपने गांव में बनाऊंगी हॉस्पिटल ताकि लोगों को दे सकूं बेहतर इलाज
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 26 Dec 2017 01:18 PM IST
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डॉ अर्पिता चौधरी को मेडल देते प्रो. रतनदीप गुलेरिया व
- फोटो : amar ujala
मेडल मिलना आपका अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि मेडल अच्छा करने के लिए प्रेरित करता है। मेडल मिलने से आपकी जिम्मेदारी समाज के प्रति बढ़ जाती है, इसलिए आपको खुद को समाज में साबित करना होगा। यह बात केजीएमयू के 113वें स्थापना दिवस समारोह में मेडिकोज को संबोधित करते हुए एम्स, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. रनदीप गुलेरिया ने कही। इस मौके पर उन्होंने मेधावी छात्र-छात्राओं को मेडल देकर सम्मानित किया।
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डॉ. दीपशिखा त्रिपाठी
- फोटो : amar ujala
अपने गांव में बनाऊंगी हॉस्पिटल
बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना था। पिता फार्मा कंपनी में जनरल मैनेजर हैं और मां हाउस वाइफ। बीडीएस के बाद एमडीएस करूंगी। उसके बाद अपने गांव में हॉस्पिटल खोलूंगी ताकि गांव के लोगों को बेहतर इलाज दे सकूं। हृदय रोग, लंग्स संबंधित बीमारियां हो या कैंसर आजकल सबसे अधिक बीमारियां ओरल व डेंटल हेल्थ के कारण हो रही हैं। कैंप के जरिये लोगों को इनसे बचाव के लिए जागरूक करूंगी। इससे उन्हें आगे जाकर ऐसी बीमारियों से बचाया जा सके।
- डॉ. दीपशिखा त्रिपाठी (बीडीएस)
प्रो. डॉ. गोपाल दत्त शर्मा एंड श्रीमती डी देवी गोल्ड मेडल
बचपन से ही डॉक्टर बनने का सपना था। पिता फार्मा कंपनी में जनरल मैनेजर हैं और मां हाउस वाइफ। बीडीएस के बाद एमडीएस करूंगी। उसके बाद अपने गांव में हॉस्पिटल खोलूंगी ताकि गांव के लोगों को बेहतर इलाज दे सकूं। हृदय रोग, लंग्स संबंधित बीमारियां हो या कैंसर आजकल सबसे अधिक बीमारियां ओरल व डेंटल हेल्थ के कारण हो रही हैं। कैंप के जरिये लोगों को इनसे बचाव के लिए जागरूक करूंगी। इससे उन्हें आगे जाकर ऐसी बीमारियों से बचाया जा सके।
- डॉ. दीपशिखा त्रिपाठी (बीडीएस)
प्रो. डॉ. गोपाल दत्त शर्मा एंड श्रीमती डी देवी गोल्ड मेडल
डॉ प्रतिष्ठा सिंह
- फोटो : amar ujala
शुरू से ही तय था डॉक्टर बनना
पिता डॉ. राकेश सिंह हृदय रोग विशेषज्ञ हैं और मां डॉ. श्रद्धा सिंह फिजियोलॉजी विभाग में डॉक्टर हैं। बचपन से ही तय था कि मुझे भी मां-पिता की तरह डॉक्टर बनना है। एमबीबीएस के बाद एमडी करना है। मुझे बच्चों से बहुत लगाव रहा है, इसलिए मैंने पीडियाट्रिक्स में एमडी करने का फैसला लिया है। बच्चों को बेहतर इलाज दे सकूं, इसलिए एकेडमिक्स में जाने के बजाए क्लीनिकल कार्य करूंगी।
-डॉ. प्रतिष्ठा सिंह (एमबीबीएस)
राजवंती रानी हरिहर नारायण टिक्कू गोल्ड मेडल
पिता डॉ. राकेश सिंह हृदय रोग विशेषज्ञ हैं और मां डॉ. श्रद्धा सिंह फिजियोलॉजी विभाग में डॉक्टर हैं। बचपन से ही तय था कि मुझे भी मां-पिता की तरह डॉक्टर बनना है। एमबीबीएस के बाद एमडी करना है। मुझे बच्चों से बहुत लगाव रहा है, इसलिए मैंने पीडियाट्रिक्स में एमडी करने का फैसला लिया है। बच्चों को बेहतर इलाज दे सकूं, इसलिए एकेडमिक्स में जाने के बजाए क्लीनिकल कार्य करूंगी।
-डॉ. प्रतिष्ठा सिंह (एमबीबीएस)
राजवंती रानी हरिहर नारायण टिक्कू गोल्ड मेडल
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डॉ जुन्याली हटवाल
- फोटो : amar ujala
प्रोफेशन नहीं सेवा हो डॉक्टर का मकसद
पिता बनारस में एंड्रोक्राइनोलॉजिस्ट और मां हाउस वाइफ हैं। मैंने 12वीं के बाद डॉक्टर बनने का फैसला लिया। एमबीबीएस के बाद ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनकोलॉजी में पीजी करूंगी। मेरे लिए डॉक्टर होना कोई प्रोफेशन नहीं, बल्कि सेवा है। इससे हम जरूरतमंदों की सबसे ज्यादा मदद कर सकते हैं। फिलहाल कुछ साल क्लीनिकल क्षेत्र में रह कर मरीजों की सेवा करना है।
- डॉ. जुन्याली हटवाल (एमबीबीएस)
डॉ. ए कार गोल्ड मेडल, प्रो. एडी इंजीनियर गोल्ड मेडल, कौशल्या देवी धवन गोल्ड मेडल
पिता बनारस में एंड्रोक्राइनोलॉजिस्ट और मां हाउस वाइफ हैं। मैंने 12वीं के बाद डॉक्टर बनने का फैसला लिया। एमबीबीएस के बाद ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनकोलॉजी में पीजी करूंगी। मेरे लिए डॉक्टर होना कोई प्रोफेशन नहीं, बल्कि सेवा है। इससे हम जरूरतमंदों की सबसे ज्यादा मदद कर सकते हैं। फिलहाल कुछ साल क्लीनिकल क्षेत्र में रह कर मरीजों की सेवा करना है।
- डॉ. जुन्याली हटवाल (एमबीबीएस)
डॉ. ए कार गोल्ड मेडल, प्रो. एडी इंजीनियर गोल्ड मेडल, कौशल्या देवी धवन गोल्ड मेडल
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डॉ आयुषी
- फोटो : amar ujala
मां-पिता से मिली प्रेरणा
पिता पल्मोनरी मेडिसिन के डॉक्टर और मां गायनकोलॉजिस्ट हैं। परिवार से कभी इस बात का दबाव नहीं रहा कि मुझे भी डॉक्टर ही बनना है, लेकिन बचपन से ही मां-पिता मेरी प्रेरणा रहे हैं। उन्हें देखकर ही मैं भी डॉक्टर बनीं। क्लीनिकल के बजाय एकेडमिक्स में जाना चाहती हूं ताकि मेडिकल स्टूडेंट्स को शिक्षा दे सकूं। आगे एमडी इन गायनकोलॉजी करनी है।
-डॉ. आयुषी नायर (एमबीबीएस)
डॉ. आरएमएल मेहरोत्रा मेमोरियल गोल्ड मेडल
पिता पल्मोनरी मेडिसिन के डॉक्टर और मां गायनकोलॉजिस्ट हैं। परिवार से कभी इस बात का दबाव नहीं रहा कि मुझे भी डॉक्टर ही बनना है, लेकिन बचपन से ही मां-पिता मेरी प्रेरणा रहे हैं। उन्हें देखकर ही मैं भी डॉक्टर बनीं। क्लीनिकल के बजाय एकेडमिक्स में जाना चाहती हूं ताकि मेडिकल स्टूडेंट्स को शिक्षा दे सकूं। आगे एमडी इन गायनकोलॉजी करनी है।
-डॉ. आयुषी नायर (एमबीबीएस)
डॉ. आरएमएल मेहरोत्रा मेमोरियल गोल्ड मेडल