{"_id":"5c80bcf7bdec2214305bba09","slug":"aprajita-story-of-changemakers-betiyaan","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"भाई के नखरे व मां की मौत ने बदल दी इन बेटियों की जिंदगी, जानें- इन चेंजमेकर्स बेटियों के बारे में","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भाई के नखरे व मां की मौत ने बदल दी इन बेटियों की जिंदगी, जानें- इन चेंजमेकर्स बेटियों के बारे में
Thu, 07 Mar 2019 12:11 PM IST
ishwar ashish
रोली खन्ना, अमर उजाला लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Thu, 07 Mar 2019 12:11 PM IST
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अपराजिता
- फोटो : amar ujala
खुद से जीतने की जिद है, मुझे खुद को ही हराना है, मैं भीड़ नहीं दुनिया की, मेरे अंदर एक जमाना है।
अपराजिता
- फोटो : amar ujala
गुनगुनाती बांसुरी
बांसुरी वादन का जिक्र आते ही जेहन में नाम आता है प्रख्यात बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया और उनके बाद उनकी शिष्या देवप्रिया और रसिका का। इसी राह पर चल पड़ी हैं लखनऊ की बेटी अल्का ठाकुर। बांसुरी वादन में एमपीए करने वाली पहली महिला हैं अल्का। वह छह साल की उम्र से ही बांसुरी बजा रही हैं। उनके पापा खुद एक संगीतकार हैं और बांसुरी, हारमोनियम समेत कई वाद्यों पर उनकी पकड़ है। अल्का बताती हैं, पापा को बांसुरी बजाते देखा करती थी। कहीं पापा डांटें नहीं इस डर से छुप-छुप कर बजाती थी। एक दिन मां ने देख लिया और पापा को बता दिया। पापा ने बजाने को कहा तो मैंने बांसुरी पर ओम जय जगदीश हरे... सुनाया। उसके बाद से पापा हमें सिखाने लगे। फिर मेरा एडमिशन भातखंडे में करा दिया, लेकिन जब बांसुरी वादन में कॅरिअर बनाने की बात कही तो उन्होंने मना कर दिया। हालांकि मेरी लगन देखकर बाद में उन्होंने अनुमति दे दी। अब मैं पीएचडी करूंगी। राइजिंग स्टार में शंकर महादेवन के साथ जुगलबंदी करने वाली अल्का कहती हैं कि मैं मंच पर तो प्रस्तुति दे ही रही हूं, पर मकसद स्टूडेंट्स को सिखाना है। कोई भी लड़की जो बांसुरी सीखना चाहती है और फीस के लिए पैसे नहीं हैं, तो उसे निशुल्क सिखाऊंगी। (तस्वीर में- अल्का ठाकुर)
बांसुरी वादन का जिक्र आते ही जेहन में नाम आता है प्रख्यात बांसुरीवादक हरिप्रसाद चौरसिया और उनके बाद उनकी शिष्या देवप्रिया और रसिका का। इसी राह पर चल पड़ी हैं लखनऊ की बेटी अल्का ठाकुर। बांसुरी वादन में एमपीए करने वाली पहली महिला हैं अल्का। वह छह साल की उम्र से ही बांसुरी बजा रही हैं। उनके पापा खुद एक संगीतकार हैं और बांसुरी, हारमोनियम समेत कई वाद्यों पर उनकी पकड़ है। अल्का बताती हैं, पापा को बांसुरी बजाते देखा करती थी। कहीं पापा डांटें नहीं इस डर से छुप-छुप कर बजाती थी। एक दिन मां ने देख लिया और पापा को बता दिया। पापा ने बजाने को कहा तो मैंने बांसुरी पर ओम जय जगदीश हरे... सुनाया। उसके बाद से पापा हमें सिखाने लगे। फिर मेरा एडमिशन भातखंडे में करा दिया, लेकिन जब बांसुरी वादन में कॅरिअर बनाने की बात कही तो उन्होंने मना कर दिया। हालांकि मेरी लगन देखकर बाद में उन्होंने अनुमति दे दी। अब मैं पीएचडी करूंगी। राइजिंग स्टार में शंकर महादेवन के साथ जुगलबंदी करने वाली अल्का कहती हैं कि मैं मंच पर तो प्रस्तुति दे ही रही हूं, पर मकसद स्टूडेंट्स को सिखाना है। कोई भी लड़की जो बांसुरी सीखना चाहती है और फीस के लिए पैसे नहीं हैं, तो उसे निशुल्क सिखाऊंगी। (तस्वीर में- अल्का ठाकुर)
अपराजिता
- फोटो : amar ujala
फिटनेस क्रांतिकारी
टेक्सटाइल डिजाइनर, कथक डांसर, कॉरपोरेट योगा टीचर...। और न जाने क्या-क्या है उनकी पहचान, पर वे खुद को फिटनेस क्रांतिकारी कहलाना पसंद करती हैं। नाम है मीनल द्विवेदी त्रिपाठी। कहती हैं, जागरूकता के तमाम दावों के बावजूद महिलाएं न तो अपने लिए वक्त निकालती हैं न ही अपनी सेहत पर ध्यान देती हैं। मैं महिलाओं में फिटनेस क्रांति लाना चाहती हूं, क्योंकि मैं अपनी सेहत को लेकर बहुत सतर्क रहती हूं। मीनल कहती हैं, नौकरी इसलिए छोड़ी क्योंकि पैशन कहीं खत्म होता जा रहा था। तब तक हम राजस्थान से लखनऊ आ चुके थे। मैं 3-3 घंटे तक अकेले घूमा करती थी, कई बार रात में भी निकल पड़ती। लोग कहते कि अकेले मत घूमो, पर यह एक सुरक्षित शहर है। बीते साल 15 अगस्त को आधी रात में फ्रीडम रन निकालने वाली मीनल शिवालिक में अल्ट्रा और लेह में फुल मैराथन पूरी करने वाली लखनऊ की एकमात्र महिला हैं। (तस्वीर में- मीनल द्विवेदी त्रिपाठी)
टेक्सटाइल डिजाइनर, कथक डांसर, कॉरपोरेट योगा टीचर...। और न जाने क्या-क्या है उनकी पहचान, पर वे खुद को फिटनेस क्रांतिकारी कहलाना पसंद करती हैं। नाम है मीनल द्विवेदी त्रिपाठी। कहती हैं, जागरूकता के तमाम दावों के बावजूद महिलाएं न तो अपने लिए वक्त निकालती हैं न ही अपनी सेहत पर ध्यान देती हैं। मैं महिलाओं में फिटनेस क्रांति लाना चाहती हूं, क्योंकि मैं अपनी सेहत को लेकर बहुत सतर्क रहती हूं। मीनल कहती हैं, नौकरी इसलिए छोड़ी क्योंकि पैशन कहीं खत्म होता जा रहा था। तब तक हम राजस्थान से लखनऊ आ चुके थे। मैं 3-3 घंटे तक अकेले घूमा करती थी, कई बार रात में भी निकल पड़ती। लोग कहते कि अकेले मत घूमो, पर यह एक सुरक्षित शहर है। बीते साल 15 अगस्त को आधी रात में फ्रीडम रन निकालने वाली मीनल शिवालिक में अल्ट्रा और लेह में फुल मैराथन पूरी करने वाली लखनऊ की एकमात्र महिला हैं। (तस्वीर में- मीनल द्विवेदी त्रिपाठी)
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अपराजिता
- फोटो : amar ujala
रफ्तार की साथी
भाई को छोटी-छोटी चीजें लाने के लिए कहना पड़ता था तो वह नखरे दिखाता था। एक दिन खुद ही उसकी बाइक उठाई और सीखनी शुरू कर दी। फिर रॉयल एनफील्ड चलाने का मन किया तो यही पसंदीदा बाइक बन गई। बाइकरनी ग्रुप लखनऊ चैप्टर की प्राची की यही कहानी है। वे अपनी टीम की सदस्यों देविना, नीतू सिंह, नीतू यादव, अपूर्वा, सुमति व आयशा के साथ मिलकर बाइक राइडिंग के जरिए लोगों में सड़क सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण समेत कई तरह के संदेश दे रही हैं। ग्रुप की सभी सदस्य जॉब में हैं, लेकिन बाइकिंग के बहाने अपनी सोशल ड्यूटी पूरी कर रही हैं। कहती हैं, लोग हमें सुनते हैं, क्योंकि हम कुछ अलग तरीके से जाकर अपनी बात कहते हैं।
बुर्का वाली राइडर
इसी ग्रुप की सदस्य हैं बुर्काराइडर आयशा आमीन। आयशा ने बुर्का पहनकर बाइकिंग का संदेश दिया। वे कहती हैं, मैं चार-पांच साल से बाइक चला रही हूं। मुझे कभी बुर्का पहनकर बाइक चलाने में दिक्कत नहीं हुई। आमतौर पर कहा जाता है कि हिजाब, बुर्का आपकी प्रगति में बाधा है, जबकि ऐसा होता नहीं है। अपनी परंपराओं के साथ भी हम आगे बढ़ सकते हैं। (तस्वीर में- प्राची जैन/आयशा आमीन/ देविना/ नीतू सिंह/नीतू यादव/ अपूर्वा/ सुमति अरोड़ा
भाई को छोटी-छोटी चीजें लाने के लिए कहना पड़ता था तो वह नखरे दिखाता था। एक दिन खुद ही उसकी बाइक उठाई और सीखनी शुरू कर दी। फिर रॉयल एनफील्ड चलाने का मन किया तो यही पसंदीदा बाइक बन गई। बाइकरनी ग्रुप लखनऊ चैप्टर की प्राची की यही कहानी है। वे अपनी टीम की सदस्यों देविना, नीतू सिंह, नीतू यादव, अपूर्वा, सुमति व आयशा के साथ मिलकर बाइक राइडिंग के जरिए लोगों में सड़क सुरक्षा, महिला सशक्तीकरण समेत कई तरह के संदेश दे रही हैं। ग्रुप की सभी सदस्य जॉब में हैं, लेकिन बाइकिंग के बहाने अपनी सोशल ड्यूटी पूरी कर रही हैं। कहती हैं, लोग हमें सुनते हैं, क्योंकि हम कुछ अलग तरीके से जाकर अपनी बात कहते हैं।
बुर्का वाली राइडर
इसी ग्रुप की सदस्य हैं बुर्काराइडर आयशा आमीन। आयशा ने बुर्का पहनकर बाइकिंग का संदेश दिया। वे कहती हैं, मैं चार-पांच साल से बाइक चला रही हूं। मुझे कभी बुर्का पहनकर बाइक चलाने में दिक्कत नहीं हुई। आमतौर पर कहा जाता है कि हिजाब, बुर्का आपकी प्रगति में बाधा है, जबकि ऐसा होता नहीं है। अपनी परंपराओं के साथ भी हम आगे बढ़ सकते हैं। (तस्वीर में- प्राची जैन/आयशा आमीन/ देविना/ नीतू सिंह/नीतू यादव/ अपूर्वा/ सुमति अरोड़ा
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अपराजिता
- फोटो : amar ujala
हौसला देती कविता
मां अचानक चल बसीं। दिल-दिमाग इसे बर्दाश्त नहीं कर सका और डिप्रेशन में चली गईं। कविता शर्मा का लंबा वक्त अवसाद में गुजरा। यूं ही पेंटिंग क्लास जॉइन कर ली। कैनवास और रंग के साथ धीरे-धीरे डिप्रेशन दूर होने लगा और कविता को किताबें पढ़ने में मजा आने लगा। कुछ कठिन हालात की वजह से पढ़ाई तो पीछे छूट गई, लेकिन हालात ने उन्हें इतना मजबूत बना दिया कि वह यू-ट्यूबर व मोटिवेशनल स्पीकर बन गईं। कविता कहती हैं, अवसाद के दौरान मुझे लगता था कि बस मैं बोलूं और बोलती जाऊं। ये विचार कविता में ढलते चले गए। धीरे-धीरे मैं दोस्तों के बीच बोलने लगी। मैंने यू-ट्यूब पर अपना वीडियो डाला, सबको पसंद आया। फॉलोअर्स बढ़े तो मेरा हौसला भी बढ़ गया। कविता को यू-ट्यूबर, मोटिवेशनल स्पीकर, फैशन ब्लॉगर, कवयित्री के रूप में जाना जाता है। कहती हैं कि नाम बस एक बार मिलता है, इसे इतिहास बना दीजिए। ( तस्वीर में- कविता शर्मा)
मां अचानक चल बसीं। दिल-दिमाग इसे बर्दाश्त नहीं कर सका और डिप्रेशन में चली गईं। कविता शर्मा का लंबा वक्त अवसाद में गुजरा। यूं ही पेंटिंग क्लास जॉइन कर ली। कैनवास और रंग के साथ धीरे-धीरे डिप्रेशन दूर होने लगा और कविता को किताबें पढ़ने में मजा आने लगा। कुछ कठिन हालात की वजह से पढ़ाई तो पीछे छूट गई, लेकिन हालात ने उन्हें इतना मजबूत बना दिया कि वह यू-ट्यूबर व मोटिवेशनल स्पीकर बन गईं। कविता कहती हैं, अवसाद के दौरान मुझे लगता था कि बस मैं बोलूं और बोलती जाऊं। ये विचार कविता में ढलते चले गए। धीरे-धीरे मैं दोस्तों के बीच बोलने लगी। मैंने यू-ट्यूब पर अपना वीडियो डाला, सबको पसंद आया। फॉलोअर्स बढ़े तो मेरा हौसला भी बढ़ गया। कविता को यू-ट्यूबर, मोटिवेशनल स्पीकर, फैशन ब्लॉगर, कवयित्री के रूप में जाना जाता है। कहती हैं कि नाम बस एक बार मिलता है, इसे इतिहास बना दीजिए। ( तस्वीर में- कविता शर्मा)