वे पूरी ऊर्जा से हर दायित्व निभा रहे हैं। उनमें बहुत कुछ करने का जुनून है और लक्ष्य पर नजर भी। रिजल्ट हो या नौकरी, अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं। हालांकि, इसके बावजूद वे अपने कॅरिअर, शिक्षा, प्रमोशन को लेकर सशंकित रहते हैं। असुरक्षा की भावना उन्हें आज पर फोकस नहीं करने दे रही। यहां बात हो रही है राजधानी के युवाओं की। इनकी मन:स्थिति, सोच किस दिशा में जा रही और वे कितना सोच रहे हैं, इसे लेकर ‘अमर उजाला’ ने 500 युवाओं पर सर्वे किया। इनमें कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और प्रोफेशन से जुड़े 18 से 31 वर्ष तक के नौजवानों में से 81 फीसदी ने माना कि वे जरूरत से ज्यादा सोचते हैं और उनमें हमेशा एक संशय बना रहता है।
अमर उजाला Survey: कॅरिअर, शिक्षा और प्रमोशन को लेकर 81 फीसदी युवा सशंकित
नौजवानों की मन:स्थिति और सोच की दिशा को समझने के लिए अमर उजाला ने सर्वे किया है। सर्वे में
विद्यार्थी, प्रोफेशनल्स व प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा शामिल किए गए हैं।
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युवाओं की सोच, उनकी मन:स्थिति समझने के लिए पूछे गए सवाल
सवाल-1 : क्या आपका ज्यादा समय सोचते हुए बीतता है?
70.1 फीसदी ने कहा, हां
29.9 फीसदी बोले, न
सवाल-2 : क्या छोटी-छोटी बातें आपको बड़ी लगती हैं?
64.5 फीसदी ने कहा, हां
35.5 फीसदी बोले, नहीं
सवाल-3 : कॅरिअर/शिक्षा/प्रगति को लेकर हमेशा संशय रहता है?
81.1 प्रतिशत ने कहा, हां
18.9 फीसदी ने कहा, नहीं
सवाल-4 : क्या असुरक्षा बोध हावी रहता है?
56.5 फीसदी ने कहा, नहीं
43.5 फीसदी ने कहा, हां
सवाल-5 : क्या परिवार का सपोर्ट न मिलना डर को बढ़ाता है?
58 फीसदी ने कहा, हां
42 फीसदी ने कहा, नहीं
नहीं समझ पा रहे, क्या करना है?
सर्वे में शामिल आईआईटी स्टूडेंट आयुष द्विवेदी कहते हैं कि मैं अपने आसपास देख रहा हूं कि स्टूडेंट्स समझ ही नहीं पा रहे उन्हें करना क्या है। पूरा दिन सोचते रहने में ही निकल जाता है, जिससे जो पढ़ाई या तैयारी कर रहे हैं, उस पर भी फोकस नहीं रहता। दोस्तों की इस मानसिक स्थिति का असर बाकी सब पर भी पड़ता है। खुद को अकेला कर लेना, हर वक्त परेशान और निराश रहना, दिशाहीन भटकना जैसी आदतें देखने में आ रही हैं।
विशेषज्ञ बोले-सोचने की दिशा पर रखें नजर
केजीएमयू के मनोरोग विभाग के डॉ. आदर्श त्रिपाठी कहते हैं कि किसी के मन में विचार आना गलत नहीं है। सोचना हमारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली का एक अहम हिस्सा है, लेकिन सोच नकारात्मक दिशा में जा रही है तो इसे नियंत्रित करना होगा। जब असुरक्षा का डर इस कदर बढ़ जाए कि हम उससे वर्तमान पर फोकस न कर पाएं, चिंता बढ़े, भूख और नींद पर असर दिखे और निराशा-अवसाद से घिरते दिखें तो मनोचिकित्सकों की सलाह लें।
इन बातों का रखें ध्यान
असुरक्षा हमें आने वाले कल के लिए तैयार करती है।
आशंकाएं हमेशा सच साबित नहीं होतीं।
हमें सोच के हर पहलू पर नजर रखनी होगी।
कॅरिअर का एक विकल्प रखना चाहिए।
मन और शरीर के तालमेल के लिए जीवनशैली बदलें।