दो साल पहले तक घर से लेकर स्कूल-कॉलेजों तक में बच्चों-युवाओं के हाथ में मोबाइल देने से सभी कतराते थे। हालांकि, अब कोरोना के चलते यही मोबाइल और ऑनलाइन निर्भरता आज जरूरत बन गई है। इसने जिंदगी को रुकने नहीं दिया, हालांकि इन पर निर्भरता शारीरिक व मानसिक समस्याओं का कारण बन रही है। युवाओं का कहना है कि ऑनलाइन निर्भरता ने उनकी किसी चीज पर फोकस करने की क्षमता कम कर दी है, वे खुद को एकाग्र नहीं कर पा रहे हैं।
अमर उजाला रैपिड सर्वे: ऑनलाइन निर्भरता बढ़ी तो कम होने लगी युवाओं की एकाग्रता, बोले- टीचर की डांट और दोस्तों का साथ चाहिए
‘अमर उजाला’ की ओर से राजधानी लखनऊ के 18 कॉलेज-विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों पर किए गए रैपिड सर्वे में ये पता चला है कि ऑनलाइन निर्भरता ने उनकी एकाग्रता कम कर दी है। ज्यादातर का कहना है कि ऑनलाइन सुविधाओं की कैद और कैंपस से दूरी उनकी मुश्किलें बढ़ा रही है। पेश है रैपिड सर्वे रिपोर्ट का विश्लेषण...।
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ये रहे सर्वे के परिणाम
- 71.88 फीसदी युवाओं ने माना ऑनलाइन बढ़ती निर्भरता से एकाग्रता कम हो गई है
- 28.11 ने इससे इनकार किया कि ऑनलाइन निर्भरता ने उनके फोकस को कम किया है
- 66.26 फीसदी लोगों ने माना कि बार-बार नेट कनेक्टिविटी टूटने से उनका ध्यान भंग होता है
- 33.73 प्रतिशत लोगों ने नेट कनेक्शन को इसके लिए जिम्मेदार मानने से इनकार किया
फोकस कम होने का कोई एक कारण हो तो बताएं
एकाग्रता कम होने के कारणों पर युवाओं का कहना था कि पहले सिर्फ मनोरंजन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए थोड़ी देर ऑनलाइन होते थे, अब तो समयसीमा ही नहीं रह गई। ऑनलाइन क्लास ज्वाइन करना जरूरी है। फिर पढ़ाए गए चैप्टर को पढ़ने के लिए पीडीएफ या अन्य ऑनलाइन माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है। वहीं, थोड़ा चिट-चैट, मनोरंजन जरूरी है, इसके लिए हम फिर ऑनलाइन होते हैं।
स्टूडेंट्स से पूछे गए ये सवाल
सवाल-1: क्या ऑनलाइन बढ़ती निर्भरता से उनकी एकाग्रता या किसी चीज पर फोकस करने की क्षमता कम हो रही है?
जवाब: 179 ने कहा हां, 70 ने कहा ना।
सवाल-2: क्या बीच में बार-बार टूटती नेट कनेक्टिविटी इसका कारण है?
जवाब: 165 ने कहा हां, 84 ने कहा ना।
सवाल-3: क्या व्हाट्सएप मैसेज या चैट इसका कारण है और सोशल मीडिया पर हर वक्त सक्रिय रहने की आदत इसके लिए जिम्मेदार है?
जवाब: 139 ने कहा हां, 110 ने कहा ना।
सवाल-4: क्या परिवार के माहौल में वे पढ़ नहीं पाते, हर वक्त टोकाटोकी, बीच में लोगों का आना जाना इसके लिए जिम्मेदार है?
जवाब: 164 ने कहा हां, 85 ने कहा ना।
सवाल-5: क्या स्कूल का माहौल एकाग्रता में सहयोग करता है?
जवाब: 201 ने कहा हां, 48 ने कहा ना।
युवा बोले- कॉलेज का माहौल एकाग्रता बनाए रखने में करता है मदद, घर में अभिभावकों की टोका-टाकी से मन लगाना मुश्किल
पढ़ते-पढ़ते गेम भी खेला जाता है
स्टूडेंट्स ने कहा कि हाथ में मोबाइल हो तो अंगुलियां कुछ न कुछ क्लिक करती ही रहती हैं। कभी चैटिंग, कभी गेम का लालच, कभी सोशल मीडिया पर आए कमेंट्स पर री-कमेंट्स या कुछ न मिला तो गाना सुनना हो जाता है। सीरीज देखने से भी खुद को नहीं रोक पाते हैं।
एक वर्ग ऐसा भी, जिसे कोई परेशानी नहीं है
युवाओं के एक वर्ग को इससे परेशानी नहीं है, हालांकि इनकी संख्या कम है। ऑनलाइन निर्भरता को लेकर इनका कहना है कि सोशल मीडिया तो अब जीवन का हिस्सा है। इसी तरह इंटरनेट कनेक्शन को सही रख पाना हमारे बस में नहीं हैं। कुछ स्टूडे्ंट्स का कहना है कि हम घर में सुविधाजनक तरीके से पढ़ पाते हैं। कॉलेज जाने-आने का समय बचता है।
कैंपस में टीचर की डांट, दोस्तों का साथ चाहिए
घर और कैंपस के माहौल को लेकर बात छिड़ी तो विद्यार्थी बोले-जिनके यहां बंगले-कोठी हैं, उनके लिए तो एकांत मिलना आसान है, पर ज्यादातर के यहां अलग-अलग कमरे नहीं होते हैं। लोगों का आना-जाना, अभिभावकों की टोका-टोकी, बोले गए काम भी एकाग्रता कम करते हैं। अधिकतर युवाओं का कहना था कि घर कैद की तरह हो गया है। अब हमें शिक्षकों की डांट और दोस्तों का साथ चाहिए, क्योंकि उस माहौल में पढ़ने का मन करता है।
कैंपस एंबेसडर’ से आसान हुआ जवाब लेना
सर्वे के लिए कॉलेजों/विश्वविद्यालयों से एक-एक स्टूडेंट को लिया गया, जिन्हें ‘कैंपस एंबेसडर’ मानकर सवालों को बांट दिया गया। सभी ने एक निश्चित संख्या में स्टूडेंट्स से बात की और जवाब नोट किए। ये कैंपस एंबेसडर दुर्गेश त्रिपाठी, आदित्य पांडेय, आयुष द्विवेदी, मानवी शर्मा, विकास कुमार चौधरी, रश्मि सिंह, रितिका, पुष्पा यादव, सत्यम गुप्ता, अनुभव चौधरी, उत्कर्ष अवस्थी, भरत अग्रवाल, उज्जवल गुप्ता, अनुज कुमार सिंह, अराधना वर्मा, अभिनव चौधरी हैं।