लखनऊ पुलिस का इतिहास कई रोमांचक किस्सों और जांबाजी से भरा हुआ है। यहां के अनेक पुलिस अफसर अपने काम से सुर्खियों में रहे और नागरिकों का विश्वास जीता। इस कॉलम में हम आपको ऐसे ही ‘अलग बात’ वाले वर्दी वालों से परिचित कराते हैं। इनमें विक्रम सिंह की अपनी अलग पहचान है। कप्तानी से लेकर डीजीपी बनने तक जनता की सुनवाई और घटनास्थल पर पहुंचने में कभी कोताही नहीं की।
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डीजीपी
- फोटो : amarujala
प्रदेश में बढ़े अपराध के ग्राफ और कानून व्यवस्था की बदहाली के दौरान पुलिस महानिदेशक बने विक्रम सिंह ने किसी भी जिले में संगीन वारदात होने पर बदमाशों के पकड़े जाने तक कप्तान को मौके पर डटे रहने के आदेश जारी किए। प्रत्येक शुक्रवार की परेड में सिपाहियों के साथ पुलिस अधिकारियों को भी पुलिस लाइन ग्राउंड के चक्कर लगाने पड़ते थे।
अपराध व कानून व्यवस्था में कुछ सुधार होते ही उन्होंने थानों के औचक निरीक्षण शुरू किए। विक्रम सिंह के औचक निरीक्षण का तरीका अलग ही था। लावलश्कर के साथ वातानुकूलित कार नहीं, बल्कि सादे कपड़ों में ऑटो पर सवार होकर निकलते थे। कानपुर व मेरठ में थानों के औचक निरीक्षण के बाद थानेदार से लेकर कप्तान तक हर दम मुस्तैद रहने लगे।
चौराहों पर ट्रकों से वसूली करने वाले पुलिसकर्मियों को डर बना रहता था कि उसमें कहीं डीजीपी तो नहीं सवार हैं। महिलाओं से छेड़खानी की शिकायत पर न सिर्फ संजीदगी से कार्रवाई कराते थे, बल्कि जिस स्थान पर छेड़खानी की अधिक शिकायत आती थी। वहां खुद जा धमकते थे और शोहदों की धरपकड़ कराकर ही लौटते थे।
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डीजीपी विक्रम सिंह
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जन सुनवाई को खास तवज्जो
नागरिकों की शिकायतों की सुनवाई के लिए सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह के कार्यकाल को आज भी याद किया जाता है। सुबह नौ बजे से ही शिकायतों की सुनवाई शुरू कर देते थे। मातहत अधिकारियों को हिदायत थी कि उनकी गैर मौजूदगी में कोई पीड़ित व्यक्ति मायूस न लौटे। खाली समय में शिकायतकर्ता को फोन करके उसकी शिकायत पर हुई कार्रवाई का जायजा लेते और लापरवाह पुलिसकर्मी पर कार्रवाई होती थी।