कोरोना वायरस के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन के मामले भारत में बढ़ने लगे हैं। ओमिक्रॉन को लेकर जो शोध या अध्ययन में दावे किए जा रहे हैं वे बेहद चिंताजनक हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुए शोध के मुताबिक वैक्सीन के दो डोज से बनी कमजोर एंटीबॉडी के खिलाफ ओमिक्रॉन प्रभावशाली है। एक्सपर्ट कोरोना से बचाव के लिए सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। हालांकि जानने वाली बात है कि कोरोना वायरस के इस नए ओमिक्रॉन वैरिएंट का पता कैसे लगाया जाए। ओमिक्रॉन वैरिएंट को पता लगाने के लिए एक तकनीक है जीनोम सिक्वेंसी। ये तकनीक कई दिनों से चर्चा में है, लेकिन जीनोम सीक्वेंस क्या है और कैसे पता चलता है कि कोरोना संक्रमित व्यक्ति ओमिक्रॉन वैरिएंट से ग्रसित है, इसका पता लगाने का एक प्रक्रिया है। कोरोना वैरिएंट का पता लगाकर उसके मुताबिक संक्रमण के खतरे से बचाव के लिए प्रयास किया जा सकता है। चलिए जानते हैं ओमिक्रॉन का पता लगाने की पूरी प्रक्रिया।
Omicron Variant: ओमिक्रॉन संक्रमण का पता लगाने का तरीका, इस तरह से वैरिएंट की होती है जांच
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शरीर में कैसे बनता है संक्रमण
इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंस के वाइस चांसलर डॉक्टर एसके सरीन के मुताबिक, जैसे शरीर डीएनए से मिलकर बनता है, वैसे ही संक्रमण भी डीएनए या आरएनए से मिलकर बनता है। कोरोना वायरस आरएनए से बना है।
जीनोम सिक्वेंसिंग क्या है
जीनोम सीक्वेंसिंग एक तकनीक है, जिससे आरएनए की जेनेटिक जानकारी का पता चलता है। जीनोम सीक्वेंस ये बताता है कि वायरस कैसा है और कैसे हमला कर रहा है और कैसे बढ़ सकता है।
कोरोना वेरिएंट का पता लगाने का तरीका
सबसे पहले कोरोना वायरस की जांच कराई जाती है। इसमें आरटी- पीसीआर सैंपल को बीएसएल 3 लैब में जांच होती है। वहां से इस सैंपल में से आरएनए को अलग किया जाता है। आरएनए सैंपल की जीनोम सिक्वेंसिंग जांच प्रक्रिया होती है। जिसमें आरएनए को 80 डिग्री के टेंपरेचर पर रखा जाता है। फिर सैंपल को जीनोम सीक्वेंसिंग लैब में लाकर आरएनए प्रोसेसिंग की प्रक्रिया की जाती है।
आरएनए को डीएनए में बदला जाता है
जीनोम सिक्वेंसिंग लैब में आरएनए प्रोसेसिंग की प्रक्रिया के दौरान आरएनए को डीएनए में बदला जाता है। इसे डीएनए में बदलने की वजह होती है। दरअसल, आरएनए जल्दी प्रतिक्रिया देता है, जिसकी वजह से आरएनए पर कोई भी टेस्ट करना मुमकिन नहीं होता। ऐसे में डीएनए में बदलने के लिए इसे न्यूनतम तापमान पर पीसीआर मशीन में डालते हैं फिर फ्रेगमेंटेशन के लिए भेजते हैं।
फ्रेगमेंटेशन क्या होता है
फ्रेगमेंटेशन एक प्रक्रिया है, जिसमें डीएनए को छोटे टुकड़ों में बांटा जाता है। डीएनए का सैंपल लंबा होने के कारण उसे सीक्वेंस नहीं किया जा सकता, इसलिए उसका फ्रेगमेंटेशन करना जरूरी होता है। फ्रेगमेंटेशन की प्रक्रिया में हर सैंपल को नाम से टैग किया जाता है।
एनालाइजर मशीन से जांचते हैं सैंपल की गुणवत्ता
सीक्वेंसिंग के लिए सैंपल को एनालाइजर मशीन में डालते हैं। यहां सैंपल की मात्रा और गुणवत्ता का पता चलता है। सब सही पाए जाने पर सैंपल को आगे की प्रक्रिया के लिए भेजा जाता है।
सैंपल की सीक्वेंसिंग
सैंपल को एक मशीन में डालकर कई सारे केमिकल्स के साथ मिलाते हैं। इस मशीन में पूरी सीक्वेंसिग की प्रक्रिया होती है। यहां से पता चलता है कि सैंपल में वायरस का कौन सा वैरिएंट है।
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