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हो जाएं सावधान: हर सांस के साथ शरीर में कैंसर का खतरा तो नहीं बढ़ रहा? इस रिपोर्ट ने बढ़ा दी टेंशन
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अभिलाष श्रीवास्तव
Updated Tue, 25 Aug 2026 06:06 PM IST
सार
दुनिया के 952 स्थानों पर 2000 से 2020 के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में पीएम2.5 को वायु प्रदूषण से जुड़े वैश्विक कैंसर बोझ का सबसे बड़ा कारण पाया गया। करीब 88.2 लाख मामले इससे जुड़े थे। शोधकर्ताओं ने फेफड़े ही नहीं, थायरॉयड, स्तन, किडनी और ब्लैडर कैंसर से भी संबंध पाया।
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वायु प्रदूषण के कारण बढ़ते खतरे
- फोटो : Amarujala.com/AI
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जिस हवा में आप रोज सांस ले रहे हैं, क्या वह आपके लिए सुरक्षित है? कहीं यही हवा आपको धीरे-धीरे कैंसर का मरीज तो नहीं बनाती जा रही है?
हालिया अध्ययन की रिपोर्ट में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ते वायु प्रदूषण के खतरे को लेकर फिर से अलर्ट किया है। हवा में मौजूद प्रदूषण को आमतौर पर खांसी, सांस फूलने, आंखों में जलन या फेफड़ों की बीमारी का कारण बताया जाता रहा है। लेकिन विशेषज्ञों ने सावधान किया है कि प्रदूषण के संपर्क में रहने के नुकसान इससे कहीं ज्यादा गंभीर और खतरनाक हो सकते हैं।
दुनिया के 952 स्थानों से जुटाए गए आंकड़ों और वर्ष 2000 से 2020 के बीच सामने आए करीब 10.9 करोड़ कैंसर मामलों का विश्लेषण करने वाली स्टडी में PM2.5 को सबसे महत्वपूर्ण प्रदूषकों में पाया गया। PM2.5 हवा में तैरने वाले इतने महीन कण होते हैं कि उनकी चौड़ाई इंसान के बाल से भी कई गुना कम होती है। यही छोटा आकार इसे खतरनाक बनाता है, क्योंकि सांस के साथ ये फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं और शरीर में कई तरह की जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
अध्ययनकर्ताओं ने चेताया है कि प्रदूषण विशेषतौर पर PM 2.5 के संपर्क में रहने से केवल फेफड़ों के कैंसर का खतरा नहीं रहता है, ये थायरॉयड, भोजन की नली, बड़ी आंत से लेकर ब्रेस्ट कैंसर तक का भी कारण बन सकता है।
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वायु प्रदूषण और इससे कैंसर का खतरा
- फोटो : Adobe Stock
वायु प्रदूषण से कैंसर का जोखिम
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने वालों में कैंसर के मामलों का खतरा अधिक पाया गया है। अध्ययन में पाया गया कि PM2.5 वायु प्रदूषण इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हो सकता है।
PM2.5 हवा में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका आकार 2.5 माइक्रोन यानी 0.0025 मिलीमीटर से भी कम होता है। इतने छोटे होने के कारण ये सांस के साथ शरीर के अंदर गहराई तक पहुंच सकते हैं।
अध्ययन में दुनिया के 952 स्थानों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। साल 2000 से 2020 के बीच कैंसर के कुल 10.9 करोड़ मामलों में से करीब 88.2 लाख मामले PM2.5 के लंबे समय तक संपर्क से जुड़े पाए गए। शोध के अनुसार, PM2.5 के संपर्क में रहने के कारण कैंसर के मामलों का सबसे ज्यादा बोझ सांस की नली और फेफड़ों, प्रजनन तंत्र और शरीर के हार्मोन से जुड़े अंगों के कैंसर में देखा गया।
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प्रदूषण से कैंसर होने का जोखिम
- फोटो : Adobe Stock Images
अध्ययन में क्या पता चला?
चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंस सहित कई अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर ये अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि PM2.5, ओजोन और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2) के स्तर में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी कैंसर के खतरे को बढ़ाने वाली हो सकती है।
PM2.5 में इतनी बढ़ोतरी के कारण कैंसर का खतरा 16 प्रतिशत, ओजोन में बढ़ोतरी से खतरा 4.23 प्रतिशत और NO2 से 11.7 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
PM2.5 के स्तर में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी किडनी कैंसर को 17.9 प्रतिशत और ब्लैडर यानी मूत्राशय के कैंसर के मामलों को 21.1 प्रतिशत तक बढ़ाने वाली पाई गई है।
यहां एक बात समझना जरूरी है नाइट्रोजन ऑक्साइड वाहनों, ईंधन जलने और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाला वायु प्रदूषक है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि साल 2000 से 2020 के बीच नाइट्रोजन ऑक्साइड के संपर्क के कारण करीब 66.7 लाख जबकि ओजोन के संपर्क से लगभग 26 लाख नए कैंसर के मामले सामने आए। ज्यादातर कैंसर में महिलाओं को अधिक संवेदनशील पाया गया।
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वायु प्रदूषण से होने वाले नुकसान
- फोटो : Freepik.com
99 प्रतिशत आबादी प्रदूषण की चपेट में
शोधकर्ताओं के मुताबिक, दुनिया की करीब 99 प्रतिशत आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जिसमें प्रदूषकों का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की तय वायु गुणवत्ता गाइडलाइन से ज्यादा है। सबसे ज्यादा प्रदूषण का सामना निम्न और मध्यम आय वाले देशों की आबादी कर रही है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि वायु प्रदूषण का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह शरीर के लगभग हर अंग और अंग-तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने पहले से ही PM2.5 को ग्रुप-1 कार्सिनोजेन माना गया है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि PM2.5 में कैंसर का खतरा बढ़ाने वाली हो सकती है।
अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि व्यापक प्रयास से अगर PM2.5 के संपर्क को कम किया जा सके तो सांस की नली, ब्रॉन्कस और फेफड़ों के कैंसर के करीब 17.9 प्रतिशत मामलों को रोका जा सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये निष्कर्ष वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने वाली नीतियां बनाने के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सबूत उपलब्ध कराते हैं। सभी देशों को इस बढ़ते जानलेवा जोखिम को कंट्रोल करने के लिए व्यापक तरीके से प्रयास करने की सख्त जरूरत है।
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