लिवर की बीमारियां वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती जा रही हैं। ये सिर्फ लिवर के लिए ही खतरनाक नहीं हैं, इसका पूरे शरीर पर असर हो सकता है। लिवर दिन-रात बिना रुके काम करता रहता है। खाना पचाने में मदद करने से लेकर पोषक तत्वों को प्रोसेस करने, दवाओं और विषैले पदार्थों के ब्रेक डाउन और शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन बनाने तक में इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि लिवर की बीमारियों का असर पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है।
लिवर की बीमारी: अब हर बार बायोप्सी जरूरी नहीं, एम्स के डॉक्टर ने खोज निकाला इसका आसान तरीका
लिवर की बीमारी अब केवल शराब से जुड़ी समस्या नहीं है। फैटी लिवर, मोटापा, डायबिटीज, हेपेटाइटिस भी खतरा बढ़ाते जा रहे हैं। गंभीर बीमारियों का पता लगाने के लिए डॉक्टर बायोप्सी की सलाह देते हैं, पर हर मरीज के लिए ये जरूरी नहीं होती। एम्स के डॉक्टरों ने बताया है कि बगैर बायोप्सी के भी इस खतरे की पहचान हो सकती है।
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पहले बायोप्सी के बारे में जान लीजिए
लिवर की बायोप्सी में लिवर से ऊतक का छोटा हिस्सा लेकर माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। लिवर की समस्याओं के बारे में पता लगाने के लिए डॉक्टर आमतौर पर खून की जांच, FIB-4 जैसे स्कोर और इलास्टोग्राफी जैसे टेस्ट कराते हैं जिससे जोखिमों का आकलन किया जा सकता है। कुछ मामलों में बीमारी का सही कारण या लिवर के अंदर मौजूद सूक्ष्म बदलाव जानने के लिए बायोप्सी की जरूरत पड़ती है।
मोटापे के साथ लिवर में चर्बी जमा होना आम समस्या है। कुछ लोगों में यह आगे बढ़कर लिवर फाइब्रोसिस हो जाता है। गंभीर स्थिति में लिवर को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे मरीजों की पहचान आसान बनाने के लिए एम्स दिल्ली के विशेषज्ञों ने एक नया खतरे का अंक तैयार किया है।
- मतलब बगैर बायोप्सी के भी इस खतरे की पहचान की जा सकती है।
- इसमें लिवर की सख्ती, खून की एक खास जांच और प्लेटलेट की संख्या को एक साथ देखा जाता है। शुरुआती जांच में इस तरीके के अच्छे नतीजे मिले हैं।
189 मरीजों पर हुई जांच
अध्ययन में मोटापे और लिवर में चर्बी की समस्या वाले 189 मरीजों को शामिल किया गया। सभी मरीज वजन कम करने की सर्जरी के लिए एम्स पहुंचे थे।
- इनकी सामान्य जांच के साथ लिवर की सख्ती और खून में फाइब्रोसिस से जुड़े संकेतकों की जांच की गई।
- सर्जरी के दौरान लिवर का छोटा हिस्सा लेकर भी जांच की गई, ताकि बीमारी की असली स्थिति का पता चल सके।
- जांच में 189 में से 33 मरीजों यानी 17.5 प्रतिशत में लिवर की गंभीर फाइब्रोसिस मिली। यानी करीब हर छह मरीजों में से एक का लिवर गंभीर रूप से प्रभावित था।
लिवर फाइब्रोसिस का जोखिम
डॉक्टर बताते हैं, लिवर फाइब्रोसिस वह स्थिति है जब लंबे बनी लिवर की बीमारी आपके लिवर के ऊतकों को बदलने लगती है। क्रॉनिक सूजन के कारण स्केरिंग की दिक्कत हो सकती है जिससे लिवर सख्त हो जाता है। यदि यह जारी रहती है, तो इससे सिरोसिस और लिवर फेलियर तक हो सकता है।
डॉक्टर कहते हैं, आधुनिक चिकित्सा में कई तरीके उपलब्ध हैं, जिससे समय रहते बीमारी की गंभीरता की पहचान हो सकती है साथ ही समय पर उपचार से फाइब्रोसिस को रोका जा सकता है और यहां तक कि इसे ठीक भी किया जा सकता है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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