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कोरोना वायरसः वो छह वैक्सीन जो दुनिया को कोविड-19 से बचा सकती हैं

Wed, 06 May 2020 11:08 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Wed, 06 May 2020 11:08 AM IST
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coronavirus vaccine update news today There may be a Covid 19 treatment soon
प्रतीकात्मक तस्वीर

कोरोना वायरस से संक्रमण को रोकने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक वैक्सीन तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं ताकि इस महामारी को रोका जा सके। विशेषज्ञों का कहना है कि जिस रफ्तार से वैज्ञानिक कोरोना वायरस के टीके के लिए रिसर्च कर रहे हैं, वो असाधारण है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि किसी वैक्सीन के विकास में सालों लग जाते हैं और कभी-कभी तो दशकों भी।



उदाहरण के लिए हाल ही जिस इबोला वैक्सीन को मंजूरी मिली है, उसके विकास में 16 साल का वक्त लग गया। और ये बहुत सामान्य बात है कि वैक्सीन के विकास की प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है। पहला फेज लैबोरेटरी में होता है, उसके बाद जानवरों पर परीक्षण किया जाता है। अगर प्रयोग के दौरान ये लगता है कि वैक्सीन का इस्तेमाल सुरक्षित है और प्रतिरोधक क्षमता दिखाई देने लगती है तो इंसानों पर इसका परीक्षण शुरू किया जाता है।

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वैक्सीन की छह उम्मीदें
इंसानों पर परीक्षण की प्रक्रिया भी तीन चरणों में पूरी होती है। पहले चरण में भाग लेने वाले लोगों की संख्या बहुत छोटी होती है और वे स्वस्थ होते हैं। दूसरे चरण में परीक्षण के लिए भाग लेने वाले लोगों की संख्या ज्यादा रहती है और कंट्रोल ग्रुप्स होते हैं ताकि ये देखा जा सके कि वैक्सीन कितना सुरक्षित है।

कंट्रोल ग्रुप का मतलब ऐसे समूह से होता है जो परीक्षण में भाग लेने वाले बाकी लोगों से अलग रखे जाते हैं। प्रयोग के तीसरे चरण में ये पता लगाया जाता है कि वैक्सीन की कितनी खुराक असरदार होगी। फिलहाल अच्छी बात यही है कि महज तीन महीने के भीतर कोविड-19 की वैक्सीन पर काम कर रही 90 रिसर्च टीमों में से छह उस मुकाम पर पहुंच गई हैं जिसे एक बहुत बड़ा लक्ष्य माना जाता है और वो है इंसानों पर परीक्षण। 

हम आगे उन छह टीकों के बारे में समझने की कोशिश करेंगे जिनके विकास का काम अभी चल रहा है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social Media

mRNA-1273 वैक्सीन
मॉडर्ना थेराप्युटिक्स एक अमरीकी बॉयोटेक्नॉलॉजी कंपनी है जिसका मुख्यालय मैसाचुसेट्स में है। ये कंपनी कोविड-19 की वैक्सीन के विकास के लिए नई रिसर्च रणनीति पर काम कर रही है। उनका मक्सद ऐसी वैक्सीन तैयार करने का है जो किसी व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को ट्रेन करेगी ताकि वो कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ सके और बीमारी को रोके।

ऐसा करने के लिए जो पारंपरिक तरीके अपनाए जाते हैं, उनमें जीवित लेकिन कमजोर और निष्क्रिय विषाणुओं का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन मॉडर्ना थेराप्युटिक्स की mRNA-1273 वैक्सीन में उन विषाणुओं का इस्तेमाल नहीं किया गया है जो कोविड-19 की महामारी के लिए जिम्मेदार है।

इसके ट्रायल को अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की फंडिंग मिल रही है। ये वैक्सीन मैसेंजर RNA या मैसेंजर राइबोन्यूक्लिक एसिड पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने लैब में कोरोना वायरस का जेनेटिक कोड तैयार किया है, उसके एक छोटे से हिस्से को व्यक्ति के शरीर में इंजेक्ट किए जाने की जरूरत होगी। वैज्ञानिक ये उम्मीद कर रहे हैं कि ऐसा करने से व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता संक्रमण के खिलाफ लड़ने के लिए प्रतिक्रिया करेगी।

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INO-4800 वैक्सीन
अमरीकी बॉयोटेक्नॉलॉजी कंपनी इनोवियो फार्मास्युटिकल्स का मुख्यालय पेंसिल्वेनिया में है। इनोवियो भी रिसर्च की नई रणनीति पर अमल कर रही है। कंपनी का फोकस ऐसी वैक्सीन तैयार करने पर है जिसमें मरीज के सेल्स (कोशिकाओं) में प्लाज्मिड (एक तरह की छोटी आनुवंशिक संरचना) के जरिए सीधे डीएनए इंजेक्ट किया जाएगा।

इससे मरीज के शरीर में संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज का निर्माण शुरू होने की उम्मीद है। इनोवियो और मॉडर्ना, दोनों ही नई तकनीक का सहारा ले रही हैं जिसमें एक आनुवंशिक संरचना में बदलाव किया जा रहा है या फिर उसमें सुधार किया जा रहा है।

वैक्सीन की राह में चुनौतियां
डॉक्टर फेलिपे टापिया जर्मनी के मैग्डेबर्ग में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के बायोप्रोसेस इंजीनियरिंग ग्रुप के विशेषज्ञ हैं। वे कहते हैं, "लेकिन इनमें से किसी भी तकनीक के जरिए अभी तक किसी दवा या इलाज की खोज नहीं की गई है। न ही इंसानों पर इस्तेमाल के लिए उनकी किसी खोज को अनुमति मिली है। ये बात समझ में आती है कि लोगों को इन वैक्सीन के विकास से बहुत सारी उम्मीदे हैं।"

डॉक्टर फेलिपे टापिया बताते हैं, "लेकिन आपको थोड़ा सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि ये वैसी वैक्सीन होंगी जिनका इतिहास में और कोई उदाहरण नहीं मिलता। यहां तक कि मॉडर्ना थेराप्युटिक्स के वैज्ञानिक खुद भी ये कह चुके हैं कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती इस वैक्सीन को उत्पादन और मार्केटिंग की स्थिति में पहुंचाने की है क्योंकि फिलहाल उनके पास मैसेंजर राइबोन्यूक्लिक एसिड पर आधारित वैक्सीन के विकास के लिए लाइसेंस नहीं है।

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चीन में क्या हो रहा है?
चीन में इस समय तीन वैक्सीन प्रोजेक्ट्स ऐसे हैं जिनमें ह्यूमन ट्रायल यानी इंसानों पर परीक्षण चल रहा है। इनमें उत्पादन के पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

AD5-nCoV वैक्सीन
16 मार्च को जब मॉडर्ना थेराप्युटिक्स ने इंसानों पर अपनी वैक्सीन का परीक्षण शुरू किया था, चीनी बॉयोटेक कंपनी कैंसिनो बॉयोलॉजिक्स ने भी उसी दिन अपने ट्रायल्स शुरू किए थे। इस प्रोजेक्ट में कैंसिनो बॉयोलॉजिक्स के साथ इंस्टीट्यूट ऑफ बॉयोटेक्नॉलॉजी और चाइनीज एकेडमी ऑफ मिलिट्री मेडिकल साइंसेज भी काम कर रहे हैं।

AD5-nCoV वैक्सीन में एडेनोवायरस के एक खास वर्जन का इस्तेमाल बतौर वेक्टर किया जाता है। एडेनोवायरस विषाणुओं के उस समूह को कहते हैं जो हमारी आंखों, श्वासनली, फेफड़े, आंतों और नर्वस सिस्टम में संक्रमण का कारण बनते हैं।

इनके सामान्य लक्षण हैं, बुखार, सर्दी, गले की तकलीफ, डायरिया और गुलाबी आंखें। और वेक्टर का मतलब वायरस या एजेंट से है जिसका इस्तेमाल किसी कोशिका को डीएनए पहुंचाने के लिए किया जाता है। वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि ये वेक्टर उस प्रोटीन को सक्रिय कर देगा जो संक्रमण से लड़ने में प्रतिरोधक क्षमता के लिए मददगार हो सकता है।

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