अलविदा-अलविदा, ऐ माह-ए-मुबारक अलविदा। रमजान मुबारक के आखिरी जुमे को अलविदा कहा जाता है। छोटी ईद के रूप में मनाया जाने वाला यह महीना बड़ी नियामतों का है। इसे यूं ही अलविदा नहीं कहा जाता है। लोग खुदा की बारगाह में पहुंचकर नम आंखों से अपनी बख्शीश की दुआ मांगते हैं। सभी मानते हैं कि इस माह में रहमत बरसती है और अब यह हमसे जुदा हो रहा है। अलविदा ईद मनाने की खुशी नहीं बल्कि इस माह-ए-रमजान के जाने का गम दे रहा है।
ऐ माह-ए-मुबारक अलविदाः ईद की खुशी नहीं है माह-ए-रमजान के जाने का गम
पाक माह रमजान के विदा होने का गम हर रोजेदारों के चेहरों पर साफ छलकता है। रमजान माह का आखिरी जुमा अलविदा इसलिए भी अहम माना जाता है कि इस माह जन्नत (स्वर्ग) के दरवाजे खोल दिए जाते हैं। कुरान-ए-पाक में कहा गया है कि अल्लाह की बारगाह में किया गया एक सजदा भी महत्वपूर्ण माना जाता है और अल्लाह उसके बदले 70 नेकियाें का सवाब बंदे को देता है। ऐसे पाक माह के बिछड़ने का गम हर मोमिन को होता है।
रमजान में खजूर की अहमियत अधिक होती है। खजूर खाकर रोजा खोलना सुन्नत माना गया है। आमतौर पर सामान्य दिनों में खजूर कम ही खाया जाता है, लेकिन रमजान माह के दौरान इफ्तार में इसका ही इस्तेमाल किया जाता है। इफ्तार के दौरान दूसरे फलों का भी विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता है। जो इस माह में प्रतिदिन किया जाता है।
रमजान माह के दौरान फेनी विशेष रूप से बनाई जाती है। रमजान माह की यह विशेष नियमत होती है, जो इस माह के दौरान विशेष रूप से हलवाई की दुकानें में तैयार की जाती है। दूसरी तरफ ईद पर सेवई खाने और खिलाने का रिवाज है। इसे रोजेदार कई प्रकार से तैयार करते हैं।
रमजान में इतनी सारी नियमतें हैं, जो सामान्य दिनों में कम ही मिलती हैं। खानपान में अच्छी-अच्छी चीजें होती हैं। इस माह में पढ़ा गया एक-एक शब्द आखिरत के लिए भी महत्व रखता है। यानी एक रुपया भी अगर किसी को इस माह मुबारक में दिया गया, तो उसका पुण्य अल्लाह 70 गुना देता है। ऐसे में जब यह माह हमसे जुदा हो रहा है, तो तकलीफ हो रही है। यही कारण है कि रमजान के आखिरी जुमे को अलविदा की नमाज यह कहते हुए अता की जाती है अगले साल यह महीना उन्हें नसीब होगा भी या नहीं। -मोहम्मद फारूक, नाजिम, दारुल उलूम, बाड़ी ब्राह्मणा