दिल्ली दरबार में वीरवार को सर्वदलीय बैठक में अलग-थलग पड़ने के बाद पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती की जमीन और दरक गई है। न तो पाकिस्तान से बातचीत और न ही 370 व 35ए की बहाली को तवज्जो मिलने पर अब महबूबा को जनता तथा पार्टी कैडर का विश्वास जीतने में काफी मशक्कत करनी होगी। इसके लिए वह नया दांव खेल सकती है ताकि खोए जनाधार को पाया जा सके। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा के साथ सरकार से नाता टूटने के बाद खासकर घाटी में पीडीपी का जनाधार खो रहा है। मंत्रिमंडल के कई साथी एक-एक कर उनका साथ छोड़ गए हैं। कुछ रिश्तेदारों ने भी किनारा कसने के साथ ही अन्य दलों का दामन थाम लिया है। कई पूर्व विधायक भी पार्टी से अलग हो गए हैं। विश्लेषकों के अनुसार अब दोबारा से खोए जनाधार को पाने तथा वोट बैंक को अपने पाले में करने के लिए वे जमात-ए-इस्लामी व अलगाववादी खेमे को खुश करने का दांव खेल सकती हैं। इसके तहत ही वे सोची समझी रणनीति के तहत लगातार पाकिस्तान का राग अलाप रही हैं।
सियासी हलचल: दिल्ली दरबार की बैठक में अलग-थलग पड़ने के बाद और दरकी महबूबा की जमीन, पार्टी पदाधिकारी कर रहे किनारा
उन्हें भरोसा है कि पहले की तरह इन दोनों के बल पर नैया पार हो सकती है। हालांकि, विश्लेषक यह भी कहती है कि अब दोबारा से ऐसा हो पाना मुमकिन नहीं लगता क्योंकि एक तो सरकार का रुख सख्त है। दूसरे अब लोग हकीकत जान गए हैं।
पार्टी कैडर तथा जनता का विश्वास दूसरे दलों के प्रति शिफ्ट हुआ है। ऐसे में दोबारा से उसे पाने के लिए काफी कड़ी मशक्कत करनी होगी। जम्मू विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. मोहम्मद ताजिदुद्दीन का कहना है कि दिल्ली में हुई सर्वदलीय बैठक सकारात्मक दिशा में उठाया गया कदम रहा है।
संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। परिसीमन के लिए सभी दलों को तैयार कर लेना बड़ी उपलब्धि है। अब पीडीपी का जनाधार घट रहा है। ऐसे में वह जमात ए इस्लामी तथा अलगाववादियों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकती हैं।
फारूक के किनारा कसने से घाटी की राजनीति पर पड़ेगा दूरगामी असर
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि गुपकार गठबंधन में शामिल रहने के बावजूद नेकां प्रमुख डा. फारूक अब्दुल्ला ने जिस प्रकार से पाकिस्तान से बातचीत को पीडीपी का एजेंडा बताया है, उसका भी कश्मीर की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ेगा। फारूक के पल्ला झाड़ने से यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान से बातचीत की नेकां पक्षधर नहीं है। नेकां का घाटी में बड़ा कैडर है। जम्मू संभाग के कुछ हिस्सों में भी पार्टी की अच्छी पकड़ है। ऐसे में लोगों के बीच यह संदेश गया है कि गुपकार गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
यह भी पढ़ें- कोरोना टीकाकरण: जम्मू-कश्मीर को नंबर वन बनाने की तैयारी, 45 से अधिक आयु वर्ग में 80 फीसदी से ज्यादा लक्ष्य पूरा