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कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का दर्दः हाथ पैर की हड्डियां तोड़ीं, आंख फोड़ी फिर...

Tue, 19 Jan 2021 04:37 PM IST
प्रशांत कुमार बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Tue, 19 Jan 2021 04:37 PM IST
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Kashmiri Pandits Displacement 19 January 1990
19 जनवरी 1990 कश्मीरी पंडितों का विस्थापन - फोटो : सोशल मीडिया

कश्मीरी पंडितों को तीन दशक पहले घाटी में उपजे हालात के बाद रातों रात घाटी छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था। अब भी उनकी आंखों में विस्थापन का दर्द है। कई परिवार ऐसे भी हैं जिनकी महिलाओं की मांग का सिंदूर उजड़ गया। कई के सिर से पिता का साया उठ गया। कई को अपने माता-पिता को खोना पड़ा। अब भी वे उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। कहते हैं कि ऐसा लगता था कि उस दौरान सरकार नाम की चीज नहीं थी। मस्जिदों से एलान के साथ ही सड़कों पर आतंकियों का ही राज था। अमर उजाला ने कई परिवारों से बात कर उनका दुख दर्द सुना। पेश हैं अंश...


 

हाथ पैर की हड्डियां तोड़ीं, आंख फोड़ी और मार दी गोली...

Kashmiri Pandits Displacement 19 January 1990
19 जनवरी 1990 कश्मीरी पंडितों का विस्थापन - फोटो : सोशल मीडिया

काली रात का खौफ। अब भी सिहर उठता है जेहन। बात 22 फरवरी 1991 की है। पापा रोशन लाल कौल की आतंकियों ने यातनाएं देकर हत्या कर दी। मुट्ठी गांव में ख्रीव इलाके के लादोह की रहने वाली बेटी रुक्मिणी और उनकी मां उषा कौल की आंखें भर आती हैं उस मंजर को याद करते हुए। कहती हैं रोशन लाल एमईएस में तैनात थे। बहादुर थे। पंडितों के कश्मीर छोड़ने के बाद भी उन्होंने घाटी नहीं छोड़ी। बच्चों के लिए जरूर जम्मू छोड़ दिया। 22 फरवरी को वे सेना के एक अफसर को छोड़ने के बाद गाड़ी से लौट रहे थे। रास्ते में सार गांव के पास दर्जन भर आतंकियों ने गाड़ी रोक ली।

इसके बाद जो कुछ हुआ उसने हमारी जिंदगी तबाह कर दी...

Kashmiri Pandits Displacement 19 January 1990
19 जनवरी 1990 कश्मीरी पंडितों का विस्थापन - फोटो : सोशल मीडिया

इसके बाद जो कुछ हुआ उसने हमारी जिंदगी तबाह कर दी। आतंकियों ने उनके हाथ-पैर की अंगुलियों को बुरी तरह तोड़ दिया। दोनों आंखों को कील से फोड़ दिया। इसके बाद गोली मारकर हत्या कर दी। देर रात तक नहीं लौटे तो चिंता हुई। सभी जगह तलाश करने के बाद भी पता नहीं चला। सुबह सूचना मिली कि पास के गांव कनिबल में एक लाश पड़ी है। पहुंचने पर पता चला कि वह रोशन की लाश है। इसके बाद सेना ने पार्थिव शरीर को पूरे सम्मान के साथ जम्मू पहुंचाया। यहां रीति रिवाज से उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस घटना ने कश्मीर से नाता जरूर तोड़ दिया, लेकिन अब भी अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की तड़प है। पुश्तैनी घर और जमीन भी है। सालभर में जाकर उसकी देखभाल करनी पड़ती है।


 
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बात 19 जनवरी 1990 रात साढ़े नौ बजे की है, पति-पत्नी ने डर से रात कुएं में छिपकर बिताई...

Kashmiri Pandits Displacement 19 January 1990
19 जनवरी 1990 कश्मीरी पंडितों का विस्थापन - फोटो : सोशल मीडिया

बात 19 जनवरी 1990 रात साढ़े नौ बजे की है। सड़क पर चारों ओर नारे गूंज रहे थे। आतंकियों का सड़क पर डेरा था। मस्जिदों से एलान हो रहे थे। खौफ का माहौल था। हिंदू समाज के लोग एक दूसरे से फोन पर इलाके का हाल जान रहे थे। रैनावाड़ी इलाके में रहने वाला हर हिंदू घरों में कैद था। यह कहना है पॉलीटेक्निक कॉलेज में डिमॉन्स्ट्रेटर और वर्तमान में बूटा नगर में रहने वाले लिनेन भट का। कहते हैं कि वे वहां किराए पर रहते थे। मकान मालिक ने हाथ खड़े कर दिए थे। खौफ इतना था कि लग रहा था कि आतंकी घर पर हमला न कर दें। घर के पिछवाड़े एक कुआं था जो सूख चुका था। वह और उनकी पत्नी ने रात कुएं में बिताई। अगले दिन शहर में कर्फ्यू लग गया। चार फरवरी को स्थिति थोड़ी सामान्य हुई तो वे पत्नी के साथ जम्मू चले आए। कहते हैं कि सभी पुलिस थानों, अस्पतालों व सरकारी भवनों पर आतंकियों का नियंत्रण था। उनके बडगाम स्थित पैतृक गांव नागाम में बादाम के बगीचे पर हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने कब्जा कर लिया। फल से मिलने वाले पैसे का आतंकी संगठन में इस्तेमाल होने लगा। हालत यह थी कि आतंकियों ने फरमान जारी कर रखा था कि घर से बाहर निकलने पर घड़ी में पाकिस्तानी समय होना चाहिए।

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पिता की हत्या के बाद घरों को लगा दी आग...

Kashmiri Pandits Displacement 19 January 1990
19 जनवरी 1990 कश्मीरी पंडितों का विस्थापन - फोटो : सोशल मीडिया

हीरालाल बाली फिल्मी जगत से जुड़े रामानंद सागर, अनुपम खेर और विधु विनोद चोपड़ा के पड़ोसी गांव के रहने वाले हैं। उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले के कृषहामा के हीरालाल कहते हैं कि पाकिस्तान की शह पर आतंकियों ने उन्हें उनकी मिट्टी से अलग कर दिया। 1990 में तीन चार दिसंबर की रात आतंकियों ने घर पर हमला कर पिता की हत्या कर दी। वह चीखते चिल्लाते रहे, पर पड़ोसी मदद को आगे नहीं आए। आतंकियों ने एक-एक कर परिवार के सात मकानों को जलाकर राख कर दिया। आज राख के ढेर पर घास और पेड़ पौधों का जंगल उग आया है। हत्या करने से पहले आतंकियों ने उनके पालतू कुत्ते को दिन में ही मार दिया था ताकि हमले के वक्त वह बाधा न बने। बात यहीं खत्म नहीं होती है। दिसंबर 1989 में आतंकियों ने उनके पड़ोसी व जमींदार चांद जी को पकड़ लिया था। वह किसी प्रकार अपने को छुड़ाकर भाग कर घर पहुंचे। इसके बाद पड़ोसी की गोशाला में शरण ली, लेकिन उन्होंने भी भोर में चार बजे घर से निकाल दिया। इसके बाद वे किसी प्रकार अपनी दो बहनों को लेकर वहां से निकल गए। दिव्यांग हीरालाल कहते हैं कि आतंकियों की करतूतों को देखते उनके भाई ने अप्रैल 1990 में उन्हें कंधे पर बिठाकर तीन किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक पहुंचाया और उसके बाद वे गाड़ी से जम्मू पहुंचे। अब वे सिलाई कढ़ाई कर जीविकोपार्जन कर रहे हैं।

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